महेंदर सिंह बाबू उर्फ़ बाबूजी इस देश में एक जाना पहचान नाम है। वो देश के बहुत बड़े साहित्यकार है। न जाने कितने कितने ही बड़े बड़े सम्मान उन्हें मिल चुके है । मैं उनकी बड़ी इज़्ज़त करता हूँ। चुकी वो मेरे गाँव के है इसलिए उनसे मेरे relation भी अच्छे है। शाम को बाबूजी का फ़ोन आया
"जहॉ भी हो कल सुबह 9 बजे मेरे घर पहुच जाना।" "कुछ अर्जेंट है क्या"
"हाँ बहुत ही जयादा"
"ठीक हैं बाबूजी मैं पहुच जाऊंगा" अगली सुबह
"जल्दी चलो हम।लेट हो गए" हम दोनों उनकी कार में बैठ गए साथ में और भी दो चार कार थी
"लेकिन जाना कहाँ है" मैंने बाबू जी से पूछा
"अरे तुम न्यूज़ नही देखते"
"हुआ क्या"
"हम सरकार से मिला अपना सम्मान वापस लौटा रहे है" "क्या, पर क्यों?"
"ये सरकार अपनी नैतिकता खो चुकी है इनके कामो से देश गड्ढे में जा रहा है गरीब इंसान त्राहि त्राहि कर रहा है और हम सरकार के प्रति अपना विरोध् जताने के लिए अपना पुरुस्कार वापस लौटा रहे है"
"लेकिन विरोध् जताने के लिए पुरूस्कार लौटना तो उचित नही है विरोध के तो और भी तरीके है"
"अरे नही तुम नही समझोगे,वैसे भी देश के जाने माने सभी साहित्यकार अपना अपना सम्मान..."
तभी हमारी कार के अचानक तेजी से रुकने की।वजह से बाबूजी की बात कट गयी।
"क्या हुआ बाबूजी ने ड्राईवर से पूछा"
"वो एक बूढ़ा भिखारी गाड़ी से टकरा कर साइड में गिर गया।" ड्राईवर ने जवाब दिया
"उसे तो काफी चोट लग गयी।" मैंने उस भिखारी को गाड़ी के अंदरसे देखते हुए कहा।
"मैं उसे देखता हूँ" ड्राईवर गाड़ी का दरवाजा खोलने लगा|
"अरे छोड़ो पता नही ऐसे तो कितने लोग रोज़ सड़कों पे मर जाते है तुम जल्दी सचिवालय की और चलो मीडिया वाले वहां पहुँच गए होंगे।" मैं हैरान सा बाबूजी की और देख रहा था ।गाडी आगे बढ़ने लगी।
"हाँ तो हम कहाँ थे।" बाबूजी ने मुझसे पूछा
"वैसे बाबूजी नैतिकता तो आपकी भी खो चुकी है, ड्राईवर गाड़ी रोको।" मैं गाड़ी रुकवा कर उसे बूढ़े की और बढ़ने लगा। जो सड़क के पास बेहोश पड़ा था। और मुझे लगा की आज कल मीडिया की कवरेज एक गरीब की जान से ज्यादा कीमती है।
Sunday, November 1, 2015
साहित्यकार
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लघु कथा
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