Thursday, July 7, 2016

जन्मभूमि का क़र्ज़

【 जिसकी मिट्टी में खेल कर मैं बड़ा हुआ आज उसे ही नष्ट करने का उसे आदेश मिला है, क्या यह देशभक्ति है।】

रहमतुल्ला खान पाकिस्तान एयरफोर्स में पायलट के पद पर थे। उनका जन्म राजस्थान के एक छोटे से गांव बन्दया में हुआ था। जहां से 1947 में बटवारे  के कारण उन्हें पाकिस्तान आना पड़ा यहां की ज़मीन उससे भिन्न थी । जँहा  उन्होंने अब तक अपना जीवन गुज़ारा था । लेकिन बालक मन जल्द ही पाकिस्तान को अपना वतन मान लिया। वतनपरस्ती उनकी रगों में बस चुकी थी इसीलिए देश का कर्ज चुकाने के लिए ही एयरफोर्स जॉइन की आज वो एक फाइटर प्लेन के पायलट हैं ।

सन 1965 भारत पाकिस्तान के बीच एक युद्ध शुरू हुआ, रहमतुल्ला खान को इस युद्ध के लिए चुना गया । उस वक़्त पायलट  की गिनती उंगलिओ पर होती थी इसलिए रहमतुल्ला खान पाकिस्तानी सेना के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण इंसान थे। उन्हें राजस्थान के बॉर्डर पर भेज भेजा गया ।जहां उनका जो स्वागत किया गया वो अगर  किसी राजा के बराबर नही तो उससे कमतर भी नही था। बॉर्डर से थोड़ी ही दूरी पर इस  कैंप में सीमा पर पाकिस्तान ने अच्छी फोर्स लगा रखी थी। सर्दी का मौसम था कैंप के पास सभी आग जलाकर बैठे थे। चारो और गुप अँधेरा था । संत्री अपनी अपनी ड्यूटी पर मुस्तैदी से तैनात थे।सर्द हवाएं इंसान के जिस्म में घुस कर खून को शिथिल करने का दम रखते थी। लेकिन आग की तपिश ने उनके असर को कम कर रखा था। सैनिको के अस्थायी टेंटों से घिरे सभी बैठे हुए थे। बातों का दौर चल रहा था । पुरानी यादों के झरने बह रहे थे। हर कोई दूसरे के गम और ख़ुशी में शरीक था।

" जनाब एक बात समझ में नहीं आती। हमारी सब की मिटटी एक ही है फिर भी हम लोगो ने अलग अलग मुल्क बना लिए ऐसा क्यों ?" एक सैनिक ने रहमत की और इशारा करते हुए पूछा।

"आमिर इस क्यों का ही जवाब आज तक कोई नही ढूंढ पाया। ऐसे न जाने कितने क्यों है , जिनके अगर जवाब मिल जाते तो न जाने कितने बड़े बड़े युद्ध बिना लड़े ही ख़त्म हो जाते।" रहमतुल्ला ने सैनिक के सवाल का जवाब बड़े ही दार्शनिक अंदाज़ में दिया।

रहमतुल्ला-"मुल्क बाटने का सबसे बड़ा कारण जानते हो क्या है ।"
जवाब ने वह बैठे सभी सैनिकों ने नही इंगित करने वाली मुद्रा में सिर हिला दिया।

रहमतुल्ला- "शायद कुछ लोगो को अपने उस संघर्ष की कीमत चाहिए थी , जो उनकी नजरो में उन्होंने देश की आज़ादी के लिए किया था। जबकि वास्तव में आज़ादी पाने में उनका कोई योगदान नही था।"
तभी एक सैनिक ने रहमत से  पूछा ।

"जनाब आप आजादी से पहले कहां रहते थे, सरहद के इस पार या उस पार।"
"हम्म उस पार, शायद राजस्थान में , गांव का नाम मुझे अच्छे से याद नहीं है, मैं बहुत छोटा था यही कोई 8 या 9 साल का जब हमने गाँव छोड़ दिया था ।"

"क्यों "
किसी ने सवाल दागा।

रहमत-  "मेरे अब्बू क्रांतिकारी थे l उन्हें अपने देश से बहुत प्रेम था। देश की आज़ादी की जंग में किसी पुलिस फायरिंग में उनकी मौत हो गई और उनकी मौत के बाद मेरी अम्मी  हम भाइयों को लेकर मेरे मामू के यहां आ गई । और उसके कुछ ही दिनों के बाद इस देश के टुकड़े कर दिए गए और हमे यंहा आना पड़ा। क्योकि मेरे मामू को लगता था की पाकिस्तान उनके लिए बेहतर है। लेकिन मेरा गांव मुझे आज भी याद आता है। खासकर हमारे गाँव का वो बरगद का पेड़ जिसके नीचे मैं अपने दोस्तों के साथ खेलता था। उस पेड़ के चारों तरफ मिटटी का चबूतरा बना था।जिसकी सौंधी सौंधी खुशबू आज भी मेरे मन को सुगन्धित करती है। वो हमारे गाँव की खुशहाली का प्रतिक था । हर धर्म का व्यक्ति उसके नीचे इकट्ठा होता था। और वो वृक्ष अपनी छाया देने से पहले किसी से नही पूछता था की उसका धर्म क्या है या वो कोन सी जाती का है। धर्म ,राजनीती ,आर्थिक सभी नीतियों पर  लोग वहां बैठकर कर वहां चर्चा करते थे। वो बुजुर्ग अनपढ़ थे, फिर भी उनके ज्ञान की कोई सीमा नही थी। प्रेम और सम्मान उन लोगो के अंदर कूट कूट कर भरा था।"

"आमिर जानते हो मेरी दिली ख्वाईश क्या है।"
रहमत ने एक लम्बा सांस लेते हुए। नज़र को अथाह काले आसमान पर टिकाते हुए पूछा।

' क्या '
आमिर का छोटा सा सवाल।
आमिर भी रहमत के उस कल्पना लोक में खो चूका था । जहां इस वक़्त रहमत दुनिया से बेखबर पर्यटन कर रहे थे।

एक अज़ीब सा आकर्षण होता है बचपन में एक अदभुत खिंचाव जो शायद गरूत्वाकर्षण से भी ज्यादा शक्तिशाली होता है। इंसान कभी भी इस खिंचाव से दूर नही हो पाता।बचपन का आनंद ऐसा रस होता है। जिसका स्वाद कभी भी आत्मा रूपी जिव्हा से नही जा पाता, चाहे इंसान कितना भी प्रयत्न कर ले। ऐसा ही कुछ रहमत के साथ भी हो रहा था। वो भी एक ऐसे वातवरण में खो गया था । जहां वो न मुसलमान था न हिन्दू, ना उसे हिंदुस्तान का मतलब पता था और नही पाकिस्तान का । ये समझदारी भी कितनी भयानक चीज़ है । समझदारी आने पर इंसान सबसे पहले इंसान से दूर जाता है कारन चाहे देश हो या धर्म या कुछ और। इन्ही खयालो के भवर में रहमत बहे चला जा रहा था ।की°••••••
'बताओ न हुज़ूर'
एक दूसरे सैनिक के सवाल ने उनकी तन्द्रा को भंग कर दिया।

"हनम्म्म" रहमत जैसे किसी नींद से जाग गए हो।
"मेरी दिली ख्वाईश है, की एक बार मरने से पहले अपने उस गांव मे जरूर जाऊ। वहां की मिटटी की चूमू, उस मिटटी को अपने बदन पर लपेट कर पूरे गाव् में भागता फिरू, उस मस्जिद को सज़दा करु जहां मैं अपने अब्बु के साथ जाया करता था, उस बरगद के पेड़ को आलिंगन करूँ उसकी डाली से लिपट कर ऐसे लेटा रहूँ जैसे मैं बचपन में लेटता था।"

"पर जनाब क्या ये संभव है"

"पता नही अल्लाह की क्या इच्छा है।"

इतना कहकर रहमत शायद पुरानी यादों में खो गए रात का अंधेरा गहराने लगा ठंड भी धीरे धीरे  बढ़ने लगी थी।आग की तपिश धीरे धीरे सर्द हवाएँ के झोंको के आगे बेबस सी नज़र आने लगी थी। बढ़ी हुई ढंड ने सभी को  अपने टेंट की और जाने को मजबूर कर दिया।

रहमत भी अपने टेंट में जा कर सो गए । जिस सीमा पर रहमतुल्ला को तैनात किया गया था । वहाँ इंडियन आर्मी अभी नहीं आई थी मात्र कुछ जवान ही बॉर्डर पर तैनात थे।
अगली सुबह
रहमतुल्ला खान के ऑफिसर ने उन्हे याद किया।और उन्हें आदेश मिला की भारत की सीमा के अंदर जाकर बम गिराने है। रहमतुल्लाह तुरंत तैयार हो गए और अपने हवाई जहाज को लेकर भारतीय सीमा में प्रवेश कर गए उन्हें आदेश था की उन्हें जल्द ही अपना काम खत्म कर वापस आना है  क्योकि रात के अँधेरे में वो प्लेन  काम करने लायक नही थे।

अपना प्लेन लेकर रहमतुल्लाह भारतीय सीमा में प्रवेश कर गया उनका प्लेन आग बरसाने लगा । रास्ते में आने वाले सभी भारतीय बंकरों को उन्होंने उड़ा दिया उनके बमो की वर्षा ने भारतीय सैनिको को अचरज में डाल दिया । रहमतुल्ला का प्लेन लगभग 3-4 किलोमीटर अंदर आ जाता है। अचानक उनकी निगाह नीचे पड़ती है  एक बरगद का पेड़ जिसके चारों तरफ कुछ बच्चे खेल रहे है। बच्चे उस प्लेन को देखकर ताली बजाने लगते है। रहमतुल्ला का हाथ बम गिराने वाले बट्टन पर ही था । बच्चों की ताली ने जैसे रहमत के मन के किसी कोने को झकझोर दिया। रहमतुल्ला खान की धुंधली यादें के कुछ पुराने चित्र नए रूप में उभरने लगे हर एक दृश्य उन्हें स्पष्ट नजर आने लगा यह वही बरगद का पेड़ है जिसके नीचे कभी रहमतुल्ला खान खेला करता था । उन बच्चों के बीच उन्हें अपना बचपन दिखने लगा।

"अरे वही गांव है । जहां मैंने जन्म लिया था वही गांव जिसकी मिट्टी में खेल कर मैं बड़ा हुआ ।"

रहमतुल्लाह वो दिन याद आने लगे जिन्हें कोई भी मनुष्य चाहकर भी नहीं भुला पाता जेठ के दुपहरी में मैं अपने दोस्तों के साथ  इस  पेड़ के नीचे खेलता था और वापसी में घर जाकर अब्बा जान से डांट खाता था।  रहमतुल्ला खान को जो ऑपरेशन दिया गया था उसके अनुसार उन्हें इस गांव में बर्बादी फैलानी थी जिससे इंडियन आर्मी दूसरी जगह से हटाकर यहां भेज दी जाए और दूसरी जगह पाकिस्तानी आर्मी कब्ज़ा जमा सके। रहमतुल्ला खान का दिमाग बार-बार इस बात को दोहरा रहा था की उसका कर्म है इस जगह बम गिरना ।मगर उसका ज़मीर उसे आगे ही नही बढ़ने दे रहा था। बचपन की यादों ने उनके पैरों में जंजीर डाल दी थी । बच्चों के खेल ने  उसकी यादों का जाल बनाकर रहमत को बांध दिया था उनके दिल को अपने वश में कर लिया था।

रहमत का हाथ  अभी भी उस बटन पर था, जो एक ही झटके में तबाही का तूफान इस गाओं पर गिरा सकता था। हवाई जहाज गांव के चारों तरफ घूम रहा था, गांव के बच्चे जहाज को देख कर खुश हो रहे थे  उन मासूमों को इस बात का जरा सा भी अंदाज़ा नही था कि यह जहाज आज उनकी मौत का पैगाम लेकर आया है। रहमतुल्ला खान चाहकर भी उस बटन को नहीं दबा पा रहा था। उसकी आत्मा बार बार उससे पूछ रही थी की इन निर्दोष  बच्चों को मारना क्या देशभक्ति है। आखिर ये  गांव ही तो उसकी जन्म भूमि है और जन्मभूमि मां के समान होती है। मां से दूर जाने वाला बच्चा क्या अपनी माँ की छाती को खून से लाल कर सकता है । कुछ लोगों ने अपने थोड़े से फायदे के लिए धर्म के नाम पर हिंदुस्तान पाकिस्तान बना दिए लोगों को इस्लाम का वास्ता देकर हिंदुस्तान का दुश्मन बना दिया गया। क्या अपनी जन्म भूमि को नष्ट करना इस्लाम की किसी किताब में लिखा है क्या निर्दोषों को मारना कहीं भी इस्लाम के नियमों में लिखा है। मैं एक सच्चा मुसलमान हूं और एक सच्चा मुसलमान कभी भी अपने जन्म भूमि के साथ दगा  नहीं कर सकता दिल की बातें मन ने मान ली।  पर  दिमाग अभी भी संघर्ष  कर रहा था अब तो मेरा वतन पाकिस्तान है। उसके प्रति मेरा कर्तव्य है। और उस कर्तव्य की पूर्ति के लिए मुझे ये जंग लड़नी है । इसका जवाब भी आत्मा के पास था यदि इस धरती के लोग  मेरे वतन को नुकसान पहुंचाते हैं । तो इन्हें नष्ट करना मेरा फर्ज है । लेकिन ये मासूम तो अपने खेल में व्यस्त है। ये मेरे देश का क्या नुकसान करेगे।अब मैं ऐसा नहीं कर सकता ये मासूम बच्चे जिन्हें मैं अभी नष्ट करने वाला करने वाला था। जिनको मैं तबाह करने वाला था उन्होंने मेरा या मेरे देश का कोई  नुकसान किया है नहीं ।

आखिरकार आत्मा विजयी हुई रहमत  ने अपने प्लेन को कैंप की ओर मोड़ दिया।
कैम पहुंचकर ऑफिसर ने पूछा
"रहमतुल्ला खान तुमने इतनी जल्दी  अपने ऑपरेशन को अंजाम दे दिया सुभानल्लाह"

"सर मैं ऐसा नहीं कर पाया रहमतुल्ला खान ने जवाब दिया"

" क्या क्या कहा तुमने तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं है जानते हो तुम क्या कह रहे हो।"
ऑफिसर ने क्रोध भरे लहजे में पूछा।

"जी मैं बिल्कुल जानता हूं।"

" लेकिन क्यों क्यों।"

"इस क्यों का जवाब मैं नहीं जानता,शायद ये वही क्यों है। जिसका जवाब दोनों देश की आवाम जानना चाहती है, की क्यों पाकिस्तान बना , और क्यों हिंदुस्तान पाकिस्तान बिना किसी कारण के एक दूसरे के दुश्मन बन गए। साहब क्या आपके पास है इस क्यों का जवाब"

"मैं यहां तुम्हारा लेक्चर सुनने नही आया हूँ, मत भूलो रहमत तुम एक फौजी हो, कोई दार्शनिक नही । तुम्हे अपने दिल का नही दिमाग का इस्तमाल करना चाहिये।"

"पर जनाब कभी कभी दिमाग दिल के सामने टिक नही पाता"

उसके बाद ऑफिसर ने रहमत को  बहुत कुछ कहा लेकिन वो चुपचाप खड़े सुनते रहे ।
अंत में
"ठीक है अब की बार मैं तुम्हारे साथ चलूँगा, शायद तुम्हे मालूम नही रहमत ये ऑपरेशन हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण है"

दोनों फाइटर प्लेन में सवार होकर उसको चल देते हैं गांव के पास पहुंचकर ऑफिस रहमतुल्ला का आदेश देते हैं

"ओके अब बम गिराओ "
लेकिन आदेश के प्रति कोई प्रतिक्रिया नहीं होती ।

"रहमतुल्ला खान सुना नहीं तुमने ,बम गिराओ ऑफिसर ने चिल्ला कर कहा।"
रहमतुल्लाह बटन पर हाथ रख देते हैं जिसके दबने से वह गाओं पल भर में राख के ढेर में तब्दील हो जायेगा।

"बम गिराओ रहमत" ऑफिसर चिल्लाता है।

रहमतुल्लाह कुछ भी नहीं कर रहे थे
"तुम्हे हो क्या गया है" ऑफिसर ने पूछा

"मैं नही जनता, पर मैं इस गांव पर बम नही गिरा सकता" रहमत का संक्षिप्त जवाब था।

"पर क्यों"

"ये गांव मेरी जन्मभूमि है। और मैं अपनी जन्मभूमि को अपने हाथों से बर्बाद नहीं कर सकता"

वो बात तो सही है रहमत लेकिन अब ये हमारा मुल्क नही है। और न ही यह के लोग हमारे भाई बहन अब ये हमारे दुश्मन है।

"सर कुछ लोगो ने अपने जरा से फायदे के लिए धर्म के नाम पर दो देश बना दिए क्या देश बाटने से मेरी जन्मभूमि भी बदल गयी जिस मिटटी पर मैं पैदा हुआ जिसमे ऊगा हुआ अनाज खाकर आज मैं इस काबिल हुआ की ये जहाज़ उड़ा सकूँ। अब जवान होकर मैं इसी धरती की छाती को लाल कर दूँ।  क्या मैं आज उन लोगो पर बम गिरा दू, जिनके साथ खेल कर मेरा बचपन गुजरा है। जिन लोगो ने बुरे वक़्त में मेरी अम्मी को संभाला , आज मैं उन सब लोगो का काल बन जाऊ सिर्फ इस लिए की मेरी वर्दी में दो चार तमगे जुड़ जाये नही हुजूर नही , रहमतुल्लाह खान इतना बेगैरत नही हो सकता। रहमत क्या कोई भी सच्चा मुसलमान इतना बेगैरत नही हो सकता।"

"लेकिन रहमत अब तुम पाकिस्तानी हो और ये हिंदुस्तान है बम गिरना तुम्हारा कर्तव्य है एक सच्चे मुसलमान का धर्म है।" अब ऑफिसर ने अपना काम निकलने के लिए धर्म का सहारा लिया।

"जनाब कोई भी सच्चा मुसलमान निर्दोषों को नही मार सकता और अगर मारता है। तो वो मुसलमान नही हो सकता"

"ठीक है अगर तुम नही कर सकते तो मैं करता हूँ।"
इतना कहते हुए ऑफिसर ने अपना हाथ बम गिराने वाले trigger पर रखा।

"गुस्ताखी माफ़ जनाब, ना मैं खुद ऐसा करूँगा न ही आपको करने दूंगा।" इतना कहकर रहमत ने ऑफिसर का हाथ पकड़ लिया और प्लेन को वापस कैंप की और मोड़ दिया।

"तुम इसका अंजाम जानते हो रहमत" ऑफिसर चिल्लाया।

"मौत से बड़ा भी अंजाम होगा तो भी रहमत भुगतने के लिए तैयार है।"

छोटे छोटे बच्चे प्लेन को देख कर अभी भी उछल उछल कर तालिया बजा  रहे थे। रहमत को उन हँसते खेलते बच्चों को देख कर बड़ी ख़ुशी हो रही थी।

इस घटना के बाद रहमत का कोर्ट मार्शल हो गया। पर रहमत अंदर से बहुत खुश था । वो जानता था की दुनिया में बहुत ही कम लोगो को जन्मभूमि का क़र्ज़ चुकाने का मौका मिलता है। और उसे वो मौका अल्लाह के रहमो कर्म से मिला जिसे उसने पूरी नेकनीयती से निभाया।

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