Monday, June 26, 2017

"वापसी"


"आरी ओ जमुना जल्दी से मेरे कपडे निकल दो, मैं अभी नहा कर आता हूं।"
रमलू प्रधान ने घर में घुसते हुए अपनी बीवी से कहा।
"क्या बात हुई आज आप खेत पर नही गए क्या ?"
"अरे सब बताता हूं, तुम पहले कपडे तो निकालो, और हाँ थोड़ा जल्दी करो अगर देर हो गयी तो ये अवसर जीवन में दोबारा नही मिलेगा ।"
"ऐसी क्या आफत आ गयी जो पूरा घर सर पर उठा रेखा है ?" जमना ने नहा कर बहार आये रमलू से पूछा।
"अरे मोती बता रहा था। कि शायद स्वामी महाराज अपने शिष्यों के साथ पास वाले जंगल में  ठहरे हुए है।सुबह  जब वो जंगल गया था तब वहाँ उसने कुछ संतो को देखा था। उसे ऐसा लगा जैसे वो स्वामी महाराज का ही कारंवा है। तो मैं एक बार जाके देखता हूं। अगर वो स्वामी महाराज हुए तो कोशिश करूंगा कि उन्हें एक बार गांव लिवा लाउ।"
रमलू ने कपडे पहनते हुए सारा हाल कह सुनाया।
"लेकिन मैंने तो सुना है, कि वे कभी भी किसी गांव में नही जाते" जमना ने शंका जताई।
"हाँ वो तो तूने सही सुना है। पर कोशिश करने में क्या हर्ज है। क्या पता इस गांव की किस्मत अच्छी हो और स्वामी महाराज आने को तैयार हो जाये।"
रमलू एक आशावादी  व्यक्ति है।
आशा एक ऐसी संजीवनी है। जो निरंतर मनुष्य को आगे बढ़ने के लिए प्ररित करती है। आशा के बल पर ही मनुष्य प्रगति करता है। रमलू के इस सकरात्मक व्यक्तित्व की वजह से ही आज वो अपने गांव मिदनापुर का सबसे धनी और सम्मानीय व्यक्ति बन गया है । न केवल उसके अपितु आस पास के गांव में भी इस समय ऐसा कोई व्यक्ति नहीं था जो रमलू प्रधान की बात को गिरा दे। खेती के साथ साथ रमलू एक व्यापारी भी है जिस वजह से उसका काफी घूमना होता था। बड़े बड़े शहरों  में वो घुमा हुआ था इसी कारण उसे समाज और दुनिया-दारी  की अच्छी समझ थी ।
जल्दी जल्दी तैयार होकर रमलू निकलता है। चमकते श्वेत वस्त्रों में वो किसी देवता से समान लग रहा था ।
"मोती कहाँ है " घर से निकलते ही रमलू जोर से चिल्लाया।
"आया बाबा" मोती चिल्लाया, मोती रमलू को इसी नाम से पुकारता है।
"सुनो मैं भी आपके साथ चल सकू हूँ क्या, मैं भी स्वामी महाराज के दर्शन कर लेती"
जमना ने रमलू से पूछा।
"अरे नही तू जंगल में जाके क्या करेगी। मैं उन्हें गाँव लेन की पूरी कोशिस करूँगा विश्वास रख।“
"मोती गाड़ी तैयार कर ली तूने" रमलू ने सफ़ेद चादर कंधे पर डालते हुए पूछा
"जी बाबा सब तैयार है"
रमलू अपने आलिशान घर से निकल कर गाड़ी के निकट आया। उसका ये घर उसके पुरखों ने बनाया था। जो व्यापारी थे उन्होंने घर को रास्ते से बहुत ऊंचाई पर बनाया था। पतली ईटों से बना हुआ घर मिटटी से चिना हुआ था। छत खपरेल की बनी हुई है, जो गर्मी के मौसम में घर को ठंडा रखती है। एक आम इंसान घर बनाने में जिस तकनीक का इस्तमाल कर सकता है वो सब इस घर में इस्तमाल किया हुआ है।
"मोती पानी के मटके और फल वेघर सब रख लिया ना"
"हाँ बाबा सब रख लिया अब आप जल्दी से बैठो फिर चलते है"
मादिनपुर एक छोटा सा गांव था जिसके उत्तर में नर्मदा नदी बहती थी और पूरब में जंगल था कुछ इस तरह का भौगोलिक नक्शा था कि ये नदी जंगल के बीचों बीच से निकलती हुई जाती है।

बैलगाड़ी मंज़िल की और चल पड़ी रमलू बैलगाड़ी के बाड़े से कमर लगा कर बैठ गया और न जाने किन विचारो के समंदर में खो गया।
"बाबा"
तभी मोती  के इन शब्दों ने उसके उसके ध्यान को भंग किया ।
“हम्म”
"बाबा आप कभी स्वामी महाराज से मिले हो"
" हां एक बार मिला था"
"कैसे दीखते है वो"
“उनका असली नाम स्वामी नित्यानंद है, उनके सामान ज्ञानी महात्मा पूण्य आत्मा शायद ही आज के समय में इस धरातल पर मौजूद हो। उनका ज्ञान का सागर जितना विशाल है। उतना ही उनका ह्रदय भी, वो प्रेम का सागर है उनके पास जी भी एक बार आकर प्रेम से याचना करता है। वो उसे अपना शिष्य बना लेते है। इसलिए उनके शिष्यों की संख्या बहुत है। बाबा का व्यक्तित्व बहुत ही प्रभावशाली है लंबी कद काठी, तगड़ा शरीर, वो कंधे से लेकर पैरों तक एक गहरू रंग के वस्त्र धारण करते है। लंबी लंबी हिमालय के बर्फ के सामान चमकती  सफ़ेद दाढ़ी जो धुप में और ज्यादा आकर्षक लगती है। बड़ी बड़ी शेर के सामान आँखे जिस किसी को वो क्रोध भरी आँखों से वो देख ले भला उसकी क्या मज़ाल की वो उनके सामने अपनी जुबान को जरा सी भी खोल सके।"
"क्या अब वह आपको पहचान लेंगे "
"पता नहीं रे, लेकिन मैंने सुना है कि स्वामी महाराज की याददाश्त बहुत तेज है। वह किसी भी बात को इतनी आसानी से नहीं भूलते"
 "बाबा क्या वो हमारी बात मानेंगे, हमारे गांव में आएंगे"

 " पता नहीं  यह सब तो वहां जाकर ही पता लगेगा और तू गाड़ी थोड़ा तेज चला कहीं ऐसा ना हो कि बाबा कहीं निकल जाए"
 “अरे नहीं निकलेंगे लगता है आपने उनके बारे में सुना नहीं, वह रात में यात्रा करते हैं और दिन में आराम ,सुबह जब में जंगल पहुंचा था। तब उनका कारवां आकर रुका था। तो इतनी जल्दी वह नहीं जाएंगे"
" हां शायद तू सही कह रहा है पहले तो यह पता करना है कि वह कारवां स्वामी महाराज का ही है या किसी और का"
बड़े बड़े पेड़ों की कतारों के बीच से बैलगाड़ी चली जा रही थी।
“अच्छा बाबा ये बताओ की स्वामी महाराज क्या सचमुच में भगवान है।”
“तुझे किसने कहा ?” रमलू ने अजीब सी नज़रों से मोती को निहार।
“नही सब कहते है। कि उनमें बड़ा सत है वो भगवान का ही रूप है।”
“नही रे वो तो कहते है। जो भी मुझे भागवान मानता है। उससे बड़ा मुर्ख इस दुनिया में दूसरा कोई नही, वो भी तो हम सब की तरह ही इंसान है। कोई भगवन नही है। बस वो एक पूण्य आत्मा है। जो लोगो को सदमार्ग दिखने आयी है। उन्होंने बड़ा तप क्या है। जिस के कारण वो हम सब इंसानो से भिन्न है।”
“हम्म” मोती ने सहमति जताई।
“अच्छा बाबा” मोती  नया सवाल पूछना चाहा।
“मोती बस कर ! कितने सवाल पूछता है !!!!”
“बस ये आखरी है।“
“क्या ?”
“स्वामी महाराज हमारे गांव आएंगे ना।“
“पता नही वो गाँव में जाते तो नही है। प्रार्थना करके देखेगे।“
“आप तो जानते ही है। की आपकी बहुरिया पेट से है। बोल रही थी, की ऐसे समय अगर किसी पूण्य आत्मा के दर्श हो जाते है तो संतान गुणवान होती है। और कह  रही थी कैसे भी करके स्वामी महाराज को गाँव में ले आना। वो जब से बियाह के आयी है। उसने आज तक मुझसे कुछ भी नही माँगा पहली बार कुछ माँगा है। बाबा कैसे भी करके महाराज को एक बार हमारे गाँव में ले आना। मैं आपके चरण धो धो कर पियूँगा।
“हाँ बेटा इसीलिए तो जा रहे है, वहां।” रमलू ने प्यार से मोती के सर पर हाथ फेरा। मोती को रमलू ने सदा अपने पुत्र के समान ही प्यार किया है।
“जमना भी कह रही थी, की अभी मौका है तो महाराज के दर्शन हो जाएंगे। फिर पता नही जीते जी दोबारा मौका मिले के नही।“
गांव का रास्ता खत्म हो गया। कुछ दूर तक खेत है फिर जंगल का रास्ता शरू हो जाता है। उबड़ खाबड़ रास्ते से होते हुए बैलगाड़ी आगे बढ़ी जा रही थी रमलू पुनः विचारो की गंगा में डुबकी लगाने लगा। जैसा मोती ने उस कारवां का विवरण सुनाया था। रमलू को पूरा यकीन था। कि वो स्वामी महाराज का ही करवा है। काश वो हमारी याचना स्वीकार कर ले और एक बार हमारे गांव पधारे। रमलू का जो अंदाज़ा था वो बिलकुल सही था। वो कारंवा स्वामी महाराज का ही था। स्वामी जी के सभी शिष्यों ने अपने अपने आराम के लिए जगह चुन ली थी।
लेकिन शिवानंद किसी और ही विचार में था।
"क्या हुआ शिवा, किस ग़ुम तारे में है।" उसके गुरु सखा रघुबीर ने उससे पूछा।
"कुछ नही भाई कुछ पुराने दिन याद आ गये" शिवा ने कुछ छिपाते हुए जवाब दिया।
"यूँ अचानक कैसे पुरानी यादों के समंदर में खो गए।"
"यादें समय थोड़ी देखती है। बस जब उनका मन होता है घेर लेती है मन को, असल में मेरा गांव आसपास ही है इन जंगलो को मैं पहचानता हूँ।"
"अच्छा तो ये बात है तुझे अपने गांव जाना है, जा गरुदेव से मैं बात कर लूंगा।"
"नही यार मुझे नही जाना, वैसे भी अब गांव में कौन है मेरा, वो बस ऐसे ही याद आ गयी इस जंगल को देख कर।"
"चल छोड़ अब आराम कर ले। "
"हाँ ये ठीक रहेगा।"
“क्या हुआ, शिवा ?”
एक भारी सी आवाज ने उन दोनों की बातचीत में विध्न डाला। यह आवाज  उस महापुरुष की थी, जिसे सब लोग स्वामी महाराज के नाम से जानते हैं। स्वामी महाराज यह वह शख्स है। जिसने बचपन में ही अपने घर को त्याग दिया था। 8 वर्ष की आयु में जिसे ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। बड़े बड़े साधु महात्माओं को जिसने  शास्त्रार्थ में हराया था। अपने गुरु चिन्मयानंद स्वामी से बहुत कुछ सीखा था। और सिर्फ धर्म के मार्ग पर चलना ही अपना जीवन का लक्ष्य बना लिया था। स्वामी महाराज को देखकर शिवा और रघुवीर दोनों खड़े हो गए।
“क्या हुआ शिवा।” स्वामी महाराज ने दोबारा पूछा
“कोई कष्ट है क्या पुत्र।” अचानक ही शिवा घबरा गया उसका कंठ सूखने लगा वह कोई भी जवाब देने में अपने आप को असमर्थ समझने लगा।
“नही महाराज कोई समस्या नहीं है।”  शिवा  ने धीरे से कहा।
तभी रघुबीर बीच में बोला
“महाराज इसका गांव निकट ही है, शायद इसके मन में अपने गांव में घुमाने की इच्छा है।”
“शिवा  अगर गांव जाना चाहते हो, तो चले जाओ ऐसी कोई रोक-टोक यहां नहीं है।”
“नहीं महाराज,  जो जगह मैंने एक बार छोड़ दी वहाँ दोबारा जाकर क्या करुंगा। अगर जाना होता तो मैं आप की शरण में क्यों आता। मैं ईश्वर की प्राप्ति के लिए इतने यत्नं करता हूँ अगर मैं यह जरा सा मौका नहीं छोड़ सकता तो ईश्वर की प्राप्ति कैसे होगी महाराज।
“शिवा यह तुम्हारी अपनी सोच है। लेकिन ईश्वर की प्राप्ति के लिए किसी चीज को छोड़ने की आवश्यकता नहीं है। बल्कि जुड़ने की आवश्यकता है। अगर तुम अपने गांव जाना चाहते हो तो जा सकते हो आज तो हमारा पड़ाव यही है। हम अर्द्धरात्रि में यहां से निकलेंगे तब तक तुम चाहो तो मिलकर आ सकते हो।”
“नहीं महाराज, मैं आपके चरणों को छोड़कर नहीं जा सकता।”
“जैसी तुम्हारी इच्छा बेटा, कहकर स्वामी महाराज आगे बढ़ गए, क्या हुआ? शिवा तुम स्वामी महाराज को देखकर इतना डर से क्यों गए थे।”
“कुछ नहीं जानता यार उनकी आंखों में एक ऐसी शक्ति है। इसे देखकर कभी कभी मुझे डर लगता है।”
“यदि तुम्हे उनकी आंखों में डर नजर आता है। तो वह डर तुम्हारे अंदर है शिवा, मैं इतने सालो से  महाराज के साथ हूं। उनकी आंखें आईना है। जो तुम्हारे अंदर है। वो उनकी आंखों में भी दिखाई देता हैं। अगर तुम्हारा हृदय निर्मल है।  तो तुम्हें उनकी आंखों में सिर्फ प्रेम  ही प्रेम दिखाई देगा स्वामी महाराज तो प्रेम की मूर्ति है।”
“शायद तुम सही कह रहे हो दोस्त, डर शायद मेरे अंदर ही कहीं छुपा हुआ हैं।”

उधर रमलू और  मोती जंगल में पहुंच गए मोती की बताई हुई जगह पर रमलू पहुंचा और उसने जब संतों का कारवां देखा तो देखते ही समझ गया के स्वामी महाराज का ही कारवां है महाराज के एक शिष्य के पास जाकर उन्होंने पूछा
“बाबा, यह स्वामी महाराज का कारवां है क्या?”
 शिष्य ने जवाब दिया। “जी हां”
“महाराज कहां है बाबा”
शिष्य ने एक तरफ इशारा किया जहां महाराज ध्यान में बैठे हुए थे।
रमलू और मोती दोनों जाकर महाराज के समीप हाथ जोड़कर बैठ गए कुछ समय बाद जब महाराज जी की  आंखें खुली उनकी पहली नजर रमलू पर आकर टिकी हलकी सी धुप की चांदनी रमलू के चेहरे पर पड़ रही थी। जिस की वज़ह से  रमलू का चेहरा चमक रहा था। वह अपने सावले से चेहरे पर मुस्कान लिए दोनों हाथ जोड़े स्वामी जी के और टकटकी लगाये बैठा था।
 स्वामी महाराज ने आश्चर्यचकित नजरों से रमलू की तरफ देखा !!
“तुम कौन हो भाई”  महाराज ने पुछा।
“मेरा नाम रमलू है। यह पास ही मेरा गाँव है, एक बार हरिद्वार के घाट पर आपकी मुझसे भेट हुई थी।”
“हाँ शायद मैंने भी तुम्हे पहले कभी देखा है। बताओ कैसे आना हुआ?”

“यहां से कुछ दूरी पर ही मिर्जापुर गांव है। वही मेरा घर है। पता चला की आप यह पधारे हो तो चला आया आपसे भेंट करने आपकी सेवा के लिए कुछ लाया हूं। उन्हें स्वीकार कर मुझे धन्य करे।”
“प्रधान जी, ये तो मेरा और मेरे शिष्यों का सौभाग्य है। की आप इस जंगल में हम जैसे बंजारों से मिलने पधारे हो।”

“महाराज एक विनती है। आप से”
रमलू की बात सुनकर महाराज के चेहरे पर एक हलकी सी मुस्कान तैर गयी।
“मैं तेरी विनती जानता हूं। तुम यह विनती करना चाहते हो। कि हम तेरे साथ तेरे  गांव चलें।”
“जी महाराज, इस दीन की इस विनती को स्वीकार कर लो महाराज।”
“क्षमा करना, रमलू तुम जानते हो की मैं कभी गाँव के रास्ते नही जाता माफ़ करना पुत्र, मैं तुम्हारी ये इच्छा पूरी नहीं कर सकता।”

“मैं अच्छी तरह जानता हूं महाराज लेकिन मैं यह भी जानता हूं कि आप किसी की विनती को नहीं ठुकराते।”
“किन्तु पुत्र मैं तेरी इस विनती को स्वीकार नही कर सकता। मुझे माफ़ करना ये मेरे नियमो के विपरीत  है।”
“चलो महाराज, आप की बड़ी कृपा होगी। पूरा गाँव आपका इंतजार कर रहा है। बरसो से इस गाँव को आपके चरणों का इंतज़ार है।” अब मोती भी मैदान में उतर चुका था। मोती ने भरे हुए गले से विनती की।
“ये संभव नही है पुत्र।”  इतना कह कर महाराज ने आँखे बंद कर ली और ध्यान की मुद्रा में चले गए।
चलो भाई अब स्वामी महाराज के ध्यान का समय है। एक शिष्य ने मोती और रमलू को कहा।

“चल मोती शायद हमारे गाँव के भाग इतने सीधे नही है। के किसी पुण्य आत्मा के चरण वहाँ  पड़े।”
 शायद रमलू इस बात को जानता था। की वो चाहे कितनी भी कोशिश कर ले। लेकिन स्वामी महाराज ने यदि एक बात मना कर दी तो वो अपनी बात पर अडिग रहेगे। दरसल उसके मस्तिष्क ने इस बात का पहले ही मान लिया था। की वो चाहे कितनी भी कोशिश कर ले। महाराज उसके गाँव में नही आयेंगे इस लिए उसने जल्दी ही हथियार डाल दिए थे। जब इंसान पहले ही ये सोच ले की इस युद्ध में उसकी हार होने वाली है तो बड़ी से बड़ी सेना भी आपको युद्ध नही जीता सकती। रमलू इस लड़ाई को लड़ने से पहले ही हार चूका था।  

“क्या हुआ पगले क्यों रो रहा है।” रमलू ने मोती को समझाया।
“काका आज तक मंजरी ने मुझसे कुछ नही माँगा। आज पहली बार उसने मुझसे कुछ माँगा और मैं वो दे नही पाया।  मैं उसे क्या मूह दिखाऊंगा।”




मोती की बैचनी बता रही थी। की  मोती अपनी पत्नी से बहूत ही ज्यादा प्रेम करता है। उसका प्रेम निस्वार्थ है।
“वही होता है। पगले जो ईश्वर  को मंजूर होता है।”
अक्सर इंसान अपनी अकर्मण्यता को ऐसे ही छिपाता है। वो अपने असफल होने को ईश्वर  की इच्छा से जोड़ कर अपने आप को अलग कर लेता है। और अपनी पूर्ण शक्ति प्रयोग किये बिना ही अपनी हार स्वीकार कर लेता है। जबकि सफलता के लिए आपको अपना शत प्रतिशत देना होता है। यदि उसमे आपने तिनके के बराबर भी कमी रखी तो वो तिनका ही आपकी हार का कारण बन जाता है। कुछ पाने की तीव्र इच्छा ही सफलता की कुंजी होती है।
लेकिन शायद मोती को ईश्वर की ये इच्छा मंजूर नही थी। मोती की आँखों से झर झर आंसू बहने लगे। रमलू मोती का हाथ पकड कर उसे बैलगाड़ी की और खिचता हुआ ले जाने लगता है। लेकिन मोती के दिमाग में तो कुछ और ही चल रहा था।
मोती रमलू से अपना हाथ छुड़ा कर तेज़ी से स्वामी महाराज की और दोड़ता है। और जाकर उनके चरणों में गिर जाता है। स्वामी महाराज के शिष्य उसे खीचने लगते है। लेकिन उसकी पकड़  मजबूत थी एक मेहनतकश इंसान की पकड़ को छुड़ाना संयासिओं के बस में कहाँ रमलू दूर खड़ा सब तमशा देख रहा था।
“स्वामी महराज की आँखे खुलती है। ये सब क्या है। मूर्ख छोडो मेरे चरण।”
“नहीं महाराज, मैं आपके चरण तब तक नही छोडूंगा जब तक आप मेरे गाँव चलने के लिए हामी नही भर देते।”
“और अगर मैंने हामी नही भरी तो।”
“तो मैं यही आपके चरणों में भूखा प्यासा प्राण दे दूंगा।”
“स्वामी महाराज ने क्रोध भरी आँखों से रमलू की और देखा।”
“रमलू भागा भागा आया और मोती की बाह पकड़ कर उसे अलग करने लगा।”
“मोती ये क्या तरीका है? ऐसे साधू संतों को कौन परेशान करता है। चलो यहाँ से।”
“नही बाबा, मैं यहाँ से बिना स्वामी महाराज के नही जाने वाला उनके बिना तो यहाँ से मेरे प्राण ही जा सकते है।”
यह सुन कर स्वामी महाराज बहूत जोर से हँसे। उनकी हंसी देख सभी हकेबके रहा गए। स्वामी महाराज ने दोनों हाथों से मोती को उठाया।
“पता नही तुमने मुझमे ऐसा क्या देखा की तुम मुझे अपने गाँव ले जाने के लिए अपने प्राणों की भी आहुति देने की तैयार हो गये। चलो मैं तुम्हारे लिए अपने प्रण को तोड़ देता हूँ। मैं अपने सभी शिष्यों के साथ संध्या समय में तुम्हारे गाँव आऊंगा।”
“महाराज आज तक मैंने अपने जीबन में जितनी भी ख़ुशी प्राप्त की है ये उन सब में सबसे बड़ी ख़ुशी है।” रमलू नेदोनो हाथ जोड़ कर स्वामी महराज से कहा।
“मोती तुम गाँव जाओ और स्वामी महाराज के आगमन की तयारी करो और हाँ गाँव में मुनादी भी करा देना मैं स्वामी महाराज के साथ आऊंगा।”
मोती ने स्वामी महराज के चरण स्पर्श किये और चला गया।
"महाराज  ने आज तक किसी भी भक्त के ऐसे अनुरोध को स्वीकार नहीं किया। फिर आज कैसे "
शिवा नन्द ने अपने साथी गुरुभाई रघुबीर से पूछा।
"मैं क्या जानू, शायद प्रभु की कोई लीला हो उस परमपिता के खेलो को तुम और हम क्या जाने भाई"
रघुबीर ने बड़े भोलेपन से जवाब दिया।
"हाँ रघु ये तो तूने सही कहा, कौन जाने इसे अन्तर्यामी के मन में क्या है"
उधर मोती गाँव पहुंचता है और मुनादी वाले को बुला कर पुरे गाँव में घोषणा करवा देता है की स्वामी महाराज ने गाँव में आने की हामी भर ली है।
सूरज धीरे-धीरे अपने घर की ओर वापसी कर रहा था। पंछी एक के पीछे एक कतार में अपने घर की ओर लौट रहे थे जाते हुए सूरज की लालिमा चारों ओर आकाश में फैल चुकी थी। लाल रंग का आकाश अपनी मनोहर छठा से सबको मोहित कर रहा था। पश्चिम से आती हुई ठंडी ठंडी हवाओं ने मौसम को खुशनुमा बना रखा था। रात के स्वागत में संध्या बाहें फैलाये बेताब थी। ऐसे ही माहौल में स्वामी महाराज का कारवां गांव के द्वार तक पहुंचा सबसे आगे स्वामी महाराज थे। उनके बराबर में रमलू स्वामी महाराज के पीछे उनके चार प्रमुख शिष्य गोस्वामी, नंदराम, भोला और विष्णु थे। उसके बाद स्वामी जी के सभी शिष्य दो की कतारों में एक के बाद एक बड़े अनुशासन से चल रहे थे। लगभग मध्य में  शिवा और उसके पीछे उसका मित्र रघु थे। जैसे ही कारवां गांव में प्रवेश हुआ। गांव के मुख्य द्वार पर बहुत भरी भीड़ थी। जो स्वामी महाराज के दर्शन के लिए  खड़े थे। इतनी भीड़ देखकर स्वामी महाराज आश्चर्यचकित हो गए उन्होंने रमलू से पूछा।
“क्या यह  गांव कितना बड़ा है। यहां पर कितने लोग रहते हैं।”
रमलू ने प्रसन्न मुख से जवाब दिया
“नहीं महाराज यह सभी लोग तो आपके आगमन का समाचार सुनकर आस-पास के गांव से इकट्ठा होकर आए हैं।”

गांव के मुख्य रास्ते के दोनों तरफ लोगों की भारी भीड़ जमा थी। मुख्य द्वार के समीप बीच रास्ते में एक बुजुर्ग इंसान दोनों हाथ जोड़े अपने घुटनों पर था। जैसे खुद स्वामी महाराज गांव में प्रवेश किय वह बुजुर्ग  आंखों में आंसू लिए स्वामी महाराज के चरणों में गिर गया। उसे देख कर वहाँ खड़ी भीड़ में सभी स्वामी महाराज को दंडवत प्रणाम करने लगे।

“महाराज कितने वर्षों के इंतजार के बाद आपने आज दर्शन दिया।” उस बुजुर्ग ने स्वामी महाराज से कहा।
स्वामी महाराज ने दोनों हाथों से उस बुजुर्ग को उठा लिया और अपने गले से लगा लिया। स्वामी जी  भावुक  हो गए उनकी आँखों से आंसू झर झर बहने लगे। महाराज ने रमलू से कहा “अगर मुझे मालूम होता की इस गाँव में मुझे इतना प्रेम मिलेगा तो मैं स्वयं ही यहाँ आ जाता यदि मैं आज इस गाँव में नही आता तो मुझे इतना पाप लगता की जो मेरे सभी पुण्यों को एक ही  क्षण में भस्म कर देता। “

 स्वामी महाराज धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे थी। कच्चे रास्ते पर दोनों तरफ लोग अपने घरों के बाहर हाथ जोड़े टकटकी लगाए खड़े थे। उस कच्चे रास्ते पर गांव के लोगों ने पानी का छिड़काव कर दिया था। मिटटी की भीनी भीनी गंध मन को प्रफुल्लित कर रही थी। बरसात के बाद गर्मी लगभग समाप्त हो चुकी थी। सर्दी का मौसम आने वाला था। शाम के समय हल्की हल्की सर्दी ने मौसम का आनंदमय बना दिया था। गांव की उस पगडंडी के चारों तरफ लोगो का हुजूम लगा था।
पुरुष स्त्रियाँ बच्चे बुजुर्ग सभी इस भीड़ मे शामिल थे। हर कोई बस  महाराज की एक झलक पाना चाहता था। सभी लोग दोनों हाथ जोड़ कर स्वामी जी को नमन कर रहे थे और स्वामी महाराज उन्हें आशीर्वाद देते हुए आगे बढ़ रहे थे।
कुछ दूरी के बाद एक घटना घटी भीड़ से निकल कर छोटी सी बच्ची अपने नन्हें पैरों से दौड़ती हुई अचानक रघु के पास आ गई और चलते हुए रघु  के केसरिया चोले को खीचने लगी।  जैसे ही रघु ने उस बच्ची की और देखा उस बच्ची ने  दोनों हाथ रघु की और बढ़ा दिए जैसे कुछ कह रही हो रघु ने उस बच्ची को गोद में उठा लिया। इस छोटी सी बच्ची ने अपने नन्हें नन्हें हाथों से रघु की गर्दन को दबोच लिया और बहुत कस के उसने रघु को पकड़ लिया उस बच्ची के पीछे उसकी मां दौड़ी दौड़ी आई और कहने लगी।
 “क्षमा करे बाबा कुछ समय पहले इस बच्ची के पिता हमें छोड़कर न जाने कहां चले गए। ये उनको बहुत याद करती है  और जब भी किसी अजनबी इंसान को देखती है। उसे अपने पिता समझकर उससे इसी प्रकार लिपट जाती है।”

बच्ची की मां उसे खींचकर  अलग करने की कोशिश करने लगी। लेकिन बच्ची पूरी ताकत से रघु को पकड़े हुई थी। और बाबा बाबा कह रही थी। शायद अपने पिता को याद कर रही थी। “इतनी प्यारी बच्ची को छोड़ कर कौन जा सकता है।” रघु मन ही मन बुदबुदाया।
 थोड़ी सी मेहनत के बाद बच्ची की मां बच्ची को अलग करने में सफल हो गयी। बच्ची बहुत  जोर जोर से रोने लगी।
उस बच्ची का रोना देख कर रघु का मन द्रवित हो रहा था। उसकी आँखों में पानी था।
“रघु चलो   करवा आगे निकला रहा है। शिवा ने रघु से कहा।  जिसने न जाने क्यों अपने चेहरे को ढक रखा था।
रघु  आगे बढ़ा  पर शायद उसका मन उस बच्ची के ही पास रह गया था। वह  बार-बार मुड़कर  उस बच्ची को देख रहा था। इस नज़ारे को करवा के हर इंसान ने देखा स्वामी महाराज ने भी । करवा गाँव के बाहर मंदिर तक पहुच गया। जहाँ स्वामी महाराज के स्वागत का पूरा इंतजाम था। महाराज के लिए एक ऊँची सी जगह तैयार कर रखा थी।
“महराज गाँव वाले चाहते है की आप उन्हें ज्ञान के दो शब्द दे।”  रमलू ने स्वामी महराज से आग्रह किया।
चेहरे पर हलकी सी मुस्कान लिए स्वामी महाराज ने कहना शरू किया।

“क्या आप लोग मुझे ज्ञानी समझते हो, आज से पहले मैं भी अपने आपको बहुत ज्ञानी समझता था। किन्तु मुझसे ज्यादा ज्ञानी तो आप लोग हो जो प्रेम के महत्व को जानते हो। ये मोती, मुझसे ज्यादा ज्ञानी है। जो आप लोगो के प्रेम के लिए, अपनी स्त्री के प्रेम के लिए मुझे यहाँ लाना चाहता था। वो छोटी सी बच्ची मुझसे ज्यादा ज्ञानी है। आज इस गाँव में आने से मुझे एक बात स्मरण हो आई है। मेरे गुरु अक्सर ईश्वर  प्राप्ति का एक सरल मार्ग बताया करते थे। लकिन समय के साथ मेरे अंदर जो अहम पैदा हुआ था। उसकी वज़ह से  मैं उस मार्ग को भूल गया। आज मोती की वज़ह  से मैं इस गाँव में आया हूँ और मुझे अपने गुरु की वो बात स्मरण हो आई। और वो ये है की यदि तुम सच्चे मन से ईश्वर  को प्राप्त करना चाहते हो  तो उसे पाने का एक मात्र सरल उपाय है ‘प्रेम’ ये जो मोती है। वो मुझे से या मेरे किसी भी शिष्य से ज्यादा इस बात को जानता है। जो केवल अपनी पत्नी के एक आग्रह पर मुझे इस गाँव में लेन के लिए अपने प्राण भी देंने को तैयार हो गया था। इसने मुझे आज एक बहुत बड़े पाप से बचा लिया अगर मैं आज आप सब के सम्मान और प्रेम को बिना पाए इस गाँव से चला जाता तो मैं एक बहुत  बड़े पाप का भागी बन जाता। और उस छोटी से बच्ची के प्रेम ने भी मेरा मन द्रवित कर दिया। जिसका पिता उसे मात्र इसलिए छोड़ गया की उसके पिता को ईश्वर  को पाना है। और वो मुर्ख ये भी नही जानता  की ईश्वर  तो उसके घर में ही हैं।  आप ही बताये की क्या इस प्यारी से बच्ची के  प्रेम को यदि आप ठुकराते है। तो ईश्वर  आप को स्वीकार कर लेगा।” “लेकिन प्रभु आपको कैसे पता की इस बच्ची के पिता ने ईश्वर  की प्राप्ति के लिए हमे छोड़ा है?”
उस बच्ची की माँ ने सवाल किया।
“बेटी इसका पता भी तुम्हे अभी चल जायेगा।”

“प्रेम और मोह में बहुत फर्क है। उस बच्ची के ह्रदय में जो है वो प्रेम है। अपने पिता के लिए और उस बच्ची के पिता के ह्रदय में ईश्वर  के लिए जो है वो मोह है।”
“प्रभु दोनों में क्या अंतर है।” शिवा ने महाराज से पुछा।
“मुझे पता था, शिवा  की तुम ये सवाल अवश्य पूछोगे।”
ये शब्द सुनकर शिवा  का सर स्वत ही नीचे झुक गया। जैसे उसकी चोरी पकड़ी गयी हो।

“बहुत बड़ा अंतर है। प्रेम निश्चल होता है। प्रेम किस को त्यागता नही, प्रेम तो सिर्फ जोड़ने का नाम है। जबकि मोह स्वार्थी होता है। वो केवल अपना फायदा सोचता है। इस स्रष्टि में ईश्वर  को पाने का एक मात्र तरीका है प्रेम सब से प्रेम करो निस्वार्थ।”

जब संत्संग समाप्त हो गया तो शिवा  आँखों में आंसू लिए स्वामी महाराज के पास गया|
“महराज एक प्रश्न है।” शिवा ने दीन भाव से स्वामी महाराज से प्रार्थना की।
मुख मंडल पर हलकी सी मुस्कान लिए स्वामी महाराज ने कहा।
“यही न की मुझे कैसे पता चला की तुम ही उस नन्ही सी बच्ची के पिता हो।”
शिवा कुछ बोल न सक बस एक छोटे बालक की तरह स्वामी महाराज के मुख को देखता रहा।
“जंगल में तुमने बताया था। की तुम्हारा गाँव आस पास ही है। जब से हमने गाँव में प्रवेश किया है। तुम अपना मुख छिपाए हुए थे। और सबसे बड़ी बात जब वो बच्ची रघु के पास आई थी। उस वक़्त तुम्हारी आँखों में उस बच्ची के लिए जो वात्सल्य, प्रेम और करुणा थी, वो केवल एक पिता की आँखों में ही हो सकती है।”
“हे प्रभु मुझे माफ़ करना मैंने आपसे झूठ बोला था। की मेरे परिवार में कोई नही है। लेकिन मेरी इच्छा मात्र ईश्वर  को प्राप्त करने की थी।”

“जो इंसान झूठ बोलना नही जानता उसका झूठ आसानी से पकड़ा जाता है। तुम्हारा झूठ तो मैंने उसी दिन पकड़ लिया था। जब तुम पहली बार मेरे पास आये थे। किन्तु तुमने वो झूठ एक अच्छे काम के लिए बोला था।”
“किन्तु महराज मैं सच्चे मन से ईश्वर को प्राप्त करना चाहता हूँ।“
स्वामी जी जोर से हँसे।
“मूर्ख  जो इंसान अपने कर्तव्यों से भागा हो, तो तुम्हे क्या लगता है क्या वो कभी ईश्वर  को प्राप्त हो सकता है। क्या उस छोटी सी बच्ची के प्रेम में ईश्वर  नही है। ईश्वर तो इस संसार के कण कण में मोजूद है। किसी के प्रेम को ठुकरा कर तुम कैसे ईश्वर  को प्राप्त हो सकते हो।
लेकिन प्रभु भगवन गौतम बुध ने भी तो ईश्वर  प्राप्ति के लिए घर त्याग दिया था।
बिल्कुल क्योकि उनके ,मन में ईश्वर  को पाने के एक तड़प थी। ईश्वर  के लिए उनका प्रेम उनके प्रति उनके परिवार के प्रेम से कही अधिक शक्तिशाली था। किन्तु तुम्हारी बेटी इस मामले में तुमसे आगे है।  तुम अपने हृदय से महसूस करके बताओ की क्या ईश्वर  के प्रति तुम्हारा प्रेम तुम्हारी बेटी के उस प्रेम से ज्यादा गहरा है? जो वो तुमसे करती है। शिवा तुम इसे आदेश मानो, सलाह मानो या फिर मेरी विनती, स्वामी महाराज ने शिवा के सम्मुख हाथ जोड़ कर कहा।”
“नही आप मेरे गुरु हो प्रभु आप आदेश दो।” शिवा स्वामी महाराज के चरणों में गिर पड़ा।
“तुम अपनी बेटी के पास लौट जाओ।” ये ही मेरी इच्छा हैं।
शिवा की आँखों से निरंतर आंसू बह रहे थे। स्वामी महाराज के चरणों को उसने अपने आंसुओ
“जाओ बेटा अब अपनी बेटी के पास लौट जाओ वो ही तुम्हारे लिए ईश्वर प्राप्ति का मार्ग है।“  

भीड़ में से वो छोटी से बच्ची दौड़ी आई और आकर उसने पीछे से शिवा की गरदन को पकड़ लिया।  उसके आलिंगन से शिवा के ह्रदय में एक तरंग से फ़ैल गयी। मस्तिष्क को शून्य का एहसास होने लगा। उस क्षण शिवा को लगा की स्वामी महाराज की कोई भी बात असत्य नही हो सकती। वाकई इस मनमोहक प्रेम को छोड़ कर भला कैसे कोई ईश्वर को प्राप्त कर सकता है। ये ही तो ईश्वर का आलिंगन है, और मैं इसे पुरे संसार में ढूंढ रहा था।  





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