Monday, June 26, 2017

"वापसी"


"आरी ओ जमुना जल्दी से मेरे कपडे निकल दो, मैं अभी नहा कर आता हूं।"
रमलू प्रधान ने घर में घुसते हुए अपनी बीवी से कहा।
"क्या बात हुई आज आप खेत पर नही गए क्या ?"
"अरे सब बताता हूं, तुम पहले कपडे तो निकालो, और हाँ थोड़ा जल्दी करो अगर देर हो गयी तो ये अवसर जीवन में दोबारा नही मिलेगा ।"
"ऐसी क्या आफत आ गयी जो पूरा घर सर पर उठा रेखा है ?" जमना ने नहा कर बहार आये रमलू से पूछा।
"अरे मोती बता रहा था। कि शायद स्वामी महाराज अपने शिष्यों के साथ पास वाले जंगल में  ठहरे हुए है।सुबह  जब वो जंगल गया था तब वहाँ उसने कुछ संतो को देखा था। उसे ऐसा लगा जैसे वो स्वामी महाराज का ही कारंवा है। तो मैं एक बार जाके देखता हूं। अगर वो स्वामी महाराज हुए तो कोशिश करूंगा कि उन्हें एक बार गांव लिवा लाउ।"
रमलू ने कपडे पहनते हुए सारा हाल कह सुनाया।
"लेकिन मैंने तो सुना है, कि वे कभी भी किसी गांव में नही जाते" जमना ने शंका जताई।
"हाँ वो तो तूने सही सुना है। पर कोशिश करने में क्या हर्ज है। क्या पता इस गांव की किस्मत अच्छी हो और स्वामी महाराज आने को तैयार हो जाये।"
रमलू एक आशावादी  व्यक्ति है।
आशा एक ऐसी संजीवनी है। जो निरंतर मनुष्य को आगे बढ़ने के लिए प्ररित करती है। आशा के बल पर ही मनुष्य प्रगति करता है। रमलू के इस सकरात्मक व्यक्तित्व की वजह से ही आज वो अपने गांव मिदनापुर का सबसे धनी और सम्मानीय व्यक्ति बन गया है । न केवल उसके अपितु आस पास के गांव में भी इस समय ऐसा कोई व्यक्ति नहीं था जो रमलू प्रधान की बात को गिरा दे। खेती के साथ साथ रमलू एक व्यापारी भी है जिस वजह से उसका काफी घूमना होता था। बड़े बड़े शहरों  में वो घुमा हुआ था इसी कारण उसे समाज और दुनिया-दारी  की अच्छी समझ थी ।
जल्दी जल्दी तैयार होकर रमलू निकलता है। चमकते श्वेत वस्त्रों में वो किसी देवता से समान लग रहा था ।
"मोती कहाँ है " घर से निकलते ही रमलू जोर से चिल्लाया।
"आया बाबा" मोती चिल्लाया, मोती रमलू को इसी नाम से पुकारता है।
"सुनो मैं भी आपके साथ चल सकू हूँ क्या, मैं भी स्वामी महाराज के दर्शन कर लेती"
जमना ने रमलू से पूछा।
"अरे नही तू जंगल में जाके क्या करेगी। मैं उन्हें गाँव लेन की पूरी कोशिस करूँगा विश्वास रख।“
"मोती गाड़ी तैयार कर ली तूने" रमलू ने सफ़ेद चादर कंधे पर डालते हुए पूछा
"जी बाबा सब तैयार है"
रमलू अपने आलिशान घर से निकल कर गाड़ी के निकट आया। उसका ये घर उसके पुरखों ने बनाया था। जो व्यापारी थे उन्होंने घर को रास्ते से बहुत ऊंचाई पर बनाया था। पतली ईटों से बना हुआ घर मिटटी से चिना हुआ था। छत खपरेल की बनी हुई है, जो गर्मी के मौसम में घर को ठंडा रखती है। एक आम इंसान घर बनाने में जिस तकनीक का इस्तमाल कर सकता है वो सब इस घर में इस्तमाल किया हुआ है।
"मोती पानी के मटके और फल वेघर सब रख लिया ना"
"हाँ बाबा सब रख लिया अब आप जल्दी से बैठो फिर चलते है"
मादिनपुर एक छोटा सा गांव था जिसके उत्तर में नर्मदा नदी बहती थी और पूरब में जंगल था कुछ इस तरह का भौगोलिक नक्शा था कि ये नदी जंगल के बीचों बीच से निकलती हुई जाती है।

बैलगाड़ी मंज़िल की और चल पड़ी रमलू बैलगाड़ी के बाड़े से कमर लगा कर बैठ गया और न जाने किन विचारो के समंदर में खो गया।
"बाबा"
तभी मोती  के इन शब्दों ने उसके उसके ध्यान को भंग किया ।
“हम्म”
"बाबा आप कभी स्वामी महाराज से मिले हो"
" हां एक बार मिला था"
"कैसे दीखते है वो"
“उनका असली नाम स्वामी नित्यानंद है, उनके सामान ज्ञानी महात्मा पूण्य आत्मा शायद ही आज के समय में इस धरातल पर मौजूद हो। उनका ज्ञान का सागर जितना विशाल है। उतना ही उनका ह्रदय भी, वो प्रेम का सागर है उनके पास जी भी एक बार आकर प्रेम से याचना करता है। वो उसे अपना शिष्य बना लेते है। इसलिए उनके शिष्यों की संख्या बहुत है। बाबा का व्यक्तित्व बहुत ही प्रभावशाली है लंबी कद काठी, तगड़ा शरीर, वो कंधे से लेकर पैरों तक एक गहरू रंग के वस्त्र धारण करते है। लंबी लंबी हिमालय के बर्फ के सामान चमकती  सफ़ेद दाढ़ी जो धुप में और ज्यादा आकर्षक लगती है। बड़ी बड़ी शेर के सामान आँखे जिस किसी को वो क्रोध भरी आँखों से वो देख ले भला उसकी क्या मज़ाल की वो उनके सामने अपनी जुबान को जरा सी भी खोल सके।"
"क्या अब वह आपको पहचान लेंगे "
"पता नहीं रे, लेकिन मैंने सुना है कि स्वामी महाराज की याददाश्त बहुत तेज है। वह किसी भी बात को इतनी आसानी से नहीं भूलते"
 "बाबा क्या वो हमारी बात मानेंगे, हमारे गांव में आएंगे"

 " पता नहीं  यह सब तो वहां जाकर ही पता लगेगा और तू गाड़ी थोड़ा तेज चला कहीं ऐसा ना हो कि बाबा कहीं निकल जाए"
 “अरे नहीं निकलेंगे लगता है आपने उनके बारे में सुना नहीं, वह रात में यात्रा करते हैं और दिन में आराम ,सुबह जब में जंगल पहुंचा था। तब उनका कारवां आकर रुका था। तो इतनी जल्दी वह नहीं जाएंगे"
" हां शायद तू सही कह रहा है पहले तो यह पता करना है कि वह कारवां स्वामी महाराज का ही है या किसी और का"
बड़े बड़े पेड़ों की कतारों के बीच से बैलगाड़ी चली जा रही थी।
“अच्छा बाबा ये बताओ की स्वामी महाराज क्या सचमुच में भगवान है।”
“तुझे किसने कहा ?” रमलू ने अजीब सी नज़रों से मोती को निहार।
“नही सब कहते है। कि उनमें बड़ा सत है वो भगवान का ही रूप है।”
“नही रे वो तो कहते है। जो भी मुझे भागवान मानता है। उससे बड़ा मुर्ख इस दुनिया में दूसरा कोई नही, वो भी तो हम सब की तरह ही इंसान है। कोई भगवन नही है। बस वो एक पूण्य आत्मा है। जो लोगो को सदमार्ग दिखने आयी है। उन्होंने बड़ा तप क्या है। जिस के कारण वो हम सब इंसानो से भिन्न है।”
“हम्म” मोती ने सहमति जताई।
“अच्छा बाबा” मोती  नया सवाल पूछना चाहा।
“मोती बस कर ! कितने सवाल पूछता है !!!!”
“बस ये आखरी है।“
“क्या ?”
“स्वामी महाराज हमारे गांव आएंगे ना।“
“पता नही वो गाँव में जाते तो नही है। प्रार्थना करके देखेगे।“
“आप तो जानते ही है। की आपकी बहुरिया पेट से है। बोल रही थी, की ऐसे समय अगर किसी पूण्य आत्मा के दर्श हो जाते है तो संतान गुणवान होती है। और कह  रही थी कैसे भी करके स्वामी महाराज को गाँव में ले आना। वो जब से बियाह के आयी है। उसने आज तक मुझसे कुछ भी नही माँगा पहली बार कुछ माँगा है। बाबा कैसे भी करके महाराज को एक बार हमारे गाँव में ले आना। मैं आपके चरण धो धो कर पियूँगा।
“हाँ बेटा इसीलिए तो जा रहे है, वहां।” रमलू ने प्यार से मोती के सर पर हाथ फेरा। मोती को रमलू ने सदा अपने पुत्र के समान ही प्यार किया है।
“जमना भी कह रही थी, की अभी मौका है तो महाराज के दर्शन हो जाएंगे। फिर पता नही जीते जी दोबारा मौका मिले के नही।“
गांव का रास्ता खत्म हो गया। कुछ दूर तक खेत है फिर जंगल का रास्ता शरू हो जाता है। उबड़ खाबड़ रास्ते से होते हुए बैलगाड़ी आगे बढ़ी जा रही थी रमलू पुनः विचारो की गंगा में डुबकी लगाने लगा। जैसा मोती ने उस कारवां का विवरण सुनाया था। रमलू को पूरा यकीन था। कि वो स्वामी महाराज का ही करवा है। काश वो हमारी याचना स्वीकार कर ले और एक बार हमारे गांव पधारे। रमलू का जो अंदाज़ा था वो बिलकुल सही था। वो कारंवा स्वामी महाराज का ही था। स्वामी जी के सभी शिष्यों ने अपने अपने आराम के लिए जगह चुन ली थी।
लेकिन शिवानंद किसी और ही विचार में था।
"क्या हुआ शिवा, किस ग़ुम तारे में है।" उसके गुरु सखा रघुबीर ने उससे पूछा।
"कुछ नही भाई कुछ पुराने दिन याद आ गये" शिवा ने कुछ छिपाते हुए जवाब दिया।
"यूँ अचानक कैसे पुरानी यादों के समंदर में खो गए।"
"यादें समय थोड़ी देखती है। बस जब उनका मन होता है घेर लेती है मन को, असल में मेरा गांव आसपास ही है इन जंगलो को मैं पहचानता हूँ।"
"अच्छा तो ये बात है तुझे अपने गांव जाना है, जा गरुदेव से मैं बात कर लूंगा।"
"नही यार मुझे नही जाना, वैसे भी अब गांव में कौन है मेरा, वो बस ऐसे ही याद आ गयी इस जंगल को देख कर।"
"चल छोड़ अब आराम कर ले। "
"हाँ ये ठीक रहेगा।"
“क्या हुआ, शिवा ?”
एक भारी सी आवाज ने उन दोनों की बातचीत में विध्न डाला। यह आवाज  उस महापुरुष की थी, जिसे सब लोग स्वामी महाराज के नाम से जानते हैं। स्वामी महाराज यह वह शख्स है। जिसने बचपन में ही अपने घर को त्याग दिया था। 8 वर्ष की आयु में जिसे ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। बड़े बड़े साधु महात्माओं को जिसने  शास्त्रार्थ में हराया था। अपने गुरु चिन्मयानंद स्वामी से बहुत कुछ सीखा था। और सिर्फ धर्म के मार्ग पर चलना ही अपना जीवन का लक्ष्य बना लिया था। स्वामी महाराज को देखकर शिवा और रघुवीर दोनों खड़े हो गए।
“क्या हुआ शिवा।” स्वामी महाराज ने दोबारा पूछा
“कोई कष्ट है क्या पुत्र।” अचानक ही शिवा घबरा गया उसका कंठ सूखने लगा वह कोई भी जवाब देने में अपने आप को असमर्थ समझने लगा।
“नही महाराज कोई समस्या नहीं है।”  शिवा  ने धीरे से कहा।
तभी रघुबीर बीच में बोला
“महाराज इसका गांव निकट ही है, शायद इसके मन में अपने गांव में घुमाने की इच्छा है।”
“शिवा  अगर गांव जाना चाहते हो, तो चले जाओ ऐसी कोई रोक-टोक यहां नहीं है।”
“नहीं महाराज,  जो जगह मैंने एक बार छोड़ दी वहाँ दोबारा जाकर क्या करुंगा। अगर जाना होता तो मैं आप की शरण में क्यों आता। मैं ईश्वर की प्राप्ति के लिए इतने यत्नं करता हूँ अगर मैं यह जरा सा मौका नहीं छोड़ सकता तो ईश्वर की प्राप्ति कैसे होगी महाराज।
“शिवा यह तुम्हारी अपनी सोच है। लेकिन ईश्वर की प्राप्ति के लिए किसी चीज को छोड़ने की आवश्यकता नहीं है। बल्कि जुड़ने की आवश्यकता है। अगर तुम अपने गांव जाना चाहते हो तो जा सकते हो आज तो हमारा पड़ाव यही है। हम अर्द्धरात्रि में यहां से निकलेंगे तब तक तुम चाहो तो मिलकर आ सकते हो।”
“नहीं महाराज, मैं आपके चरणों को छोड़कर नहीं जा सकता।”
“जैसी तुम्हारी इच्छा बेटा, कहकर स्वामी महाराज आगे बढ़ गए, क्या हुआ? शिवा तुम स्वामी महाराज को देखकर इतना डर से क्यों गए थे।”
“कुछ नहीं जानता यार उनकी आंखों में एक ऐसी शक्ति है। इसे देखकर कभी कभी मुझे डर लगता है।”
“यदि तुम्हे उनकी आंखों में डर नजर आता है। तो वह डर तुम्हारे अंदर है शिवा, मैं इतने सालो से  महाराज के साथ हूं। उनकी आंखें आईना है। जो तुम्हारे अंदर है। वो उनकी आंखों में भी दिखाई देता हैं। अगर तुम्हारा हृदय निर्मल है।  तो तुम्हें उनकी आंखों में सिर्फ प्रेम  ही प्रेम दिखाई देगा स्वामी महाराज तो प्रेम की मूर्ति है।”
“शायद तुम सही कह रहे हो दोस्त, डर शायद मेरे अंदर ही कहीं छुपा हुआ हैं।”

उधर रमलू और  मोती जंगल में पहुंच गए मोती की बताई हुई जगह पर रमलू पहुंचा और उसने जब संतों का कारवां देखा तो देखते ही समझ गया के स्वामी महाराज का ही कारवां है महाराज के एक शिष्य के पास जाकर उन्होंने पूछा
“बाबा, यह स्वामी महाराज का कारवां है क्या?”
 शिष्य ने जवाब दिया। “जी हां”
“महाराज कहां है बाबा”
शिष्य ने एक तरफ इशारा किया जहां महाराज ध्यान में बैठे हुए थे।
रमलू और मोती दोनों जाकर महाराज के समीप हाथ जोड़कर बैठ गए कुछ समय बाद जब महाराज जी की  आंखें खुली उनकी पहली नजर रमलू पर आकर टिकी हलकी सी धुप की चांदनी रमलू के चेहरे पर पड़ रही थी। जिस की वज़ह से  रमलू का चेहरा चमक रहा था। वह अपने सावले से चेहरे पर मुस्कान लिए दोनों हाथ जोड़े स्वामी जी के और टकटकी लगाये बैठा था।
 स्वामी महाराज ने आश्चर्यचकित नजरों से रमलू की तरफ देखा !!
“तुम कौन हो भाई”  महाराज ने पुछा।
“मेरा नाम रमलू है। यह पास ही मेरा गाँव है, एक बार हरिद्वार के घाट पर आपकी मुझसे भेट हुई थी।”
“हाँ शायद मैंने भी तुम्हे पहले कभी देखा है। बताओ कैसे आना हुआ?”

“यहां से कुछ दूरी पर ही मिर्जापुर गांव है। वही मेरा घर है। पता चला की आप यह पधारे हो तो चला आया आपसे भेंट करने आपकी सेवा के लिए कुछ लाया हूं। उन्हें स्वीकार कर मुझे धन्य करे।”
“प्रधान जी, ये तो मेरा और मेरे शिष्यों का सौभाग्य है। की आप इस जंगल में हम जैसे बंजारों से मिलने पधारे हो।”

“महाराज एक विनती है। आप से”
रमलू की बात सुनकर महाराज के चेहरे पर एक हलकी सी मुस्कान तैर गयी।
“मैं तेरी विनती जानता हूं। तुम यह विनती करना चाहते हो। कि हम तेरे साथ तेरे  गांव चलें।”
“जी महाराज, इस दीन की इस विनती को स्वीकार कर लो महाराज।”
“क्षमा करना, रमलू तुम जानते हो की मैं कभी गाँव के रास्ते नही जाता माफ़ करना पुत्र, मैं तुम्हारी ये इच्छा पूरी नहीं कर सकता।”

“मैं अच्छी तरह जानता हूं महाराज लेकिन मैं यह भी जानता हूं कि आप किसी की विनती को नहीं ठुकराते।”
“किन्तु पुत्र मैं तेरी इस विनती को स्वीकार नही कर सकता। मुझे माफ़ करना ये मेरे नियमो के विपरीत  है।”
“चलो महाराज, आप की बड़ी कृपा होगी। पूरा गाँव आपका इंतजार कर रहा है। बरसो से इस गाँव को आपके चरणों का इंतज़ार है।” अब मोती भी मैदान में उतर चुका था। मोती ने भरे हुए गले से विनती की।
“ये संभव नही है पुत्र।”  इतना कह कर महाराज ने आँखे बंद कर ली और ध्यान की मुद्रा में चले गए।
चलो भाई अब स्वामी महाराज के ध्यान का समय है। एक शिष्य ने मोती और रमलू को कहा।

“चल मोती शायद हमारे गाँव के भाग इतने सीधे नही है। के किसी पुण्य आत्मा के चरण वहाँ  पड़े।”
 शायद रमलू इस बात को जानता था। की वो चाहे कितनी भी कोशिश कर ले। लेकिन स्वामी महाराज ने यदि एक बात मना कर दी तो वो अपनी बात पर अडिग रहेगे। दरसल उसके मस्तिष्क ने इस बात का पहले ही मान लिया था। की वो चाहे कितनी भी कोशिश कर ले। महाराज उसके गाँव में नही आयेंगे इस लिए उसने जल्दी ही हथियार डाल दिए थे। जब इंसान पहले ही ये सोच ले की इस युद्ध में उसकी हार होने वाली है तो बड़ी से बड़ी सेना भी आपको युद्ध नही जीता सकती। रमलू इस लड़ाई को लड़ने से पहले ही हार चूका था।  

“क्या हुआ पगले क्यों रो रहा है।” रमलू ने मोती को समझाया।
“काका आज तक मंजरी ने मुझसे कुछ नही माँगा। आज पहली बार उसने मुझसे कुछ माँगा और मैं वो दे नही पाया।  मैं उसे क्या मूह दिखाऊंगा।”




मोती की बैचनी बता रही थी। की  मोती अपनी पत्नी से बहूत ही ज्यादा प्रेम करता है। उसका प्रेम निस्वार्थ है।
“वही होता है। पगले जो ईश्वर  को मंजूर होता है।”
अक्सर इंसान अपनी अकर्मण्यता को ऐसे ही छिपाता है। वो अपने असफल होने को ईश्वर  की इच्छा से जोड़ कर अपने आप को अलग कर लेता है। और अपनी पूर्ण शक्ति प्रयोग किये बिना ही अपनी हार स्वीकार कर लेता है। जबकि सफलता के लिए आपको अपना शत प्रतिशत देना होता है। यदि उसमे आपने तिनके के बराबर भी कमी रखी तो वो तिनका ही आपकी हार का कारण बन जाता है। कुछ पाने की तीव्र इच्छा ही सफलता की कुंजी होती है।
लेकिन शायद मोती को ईश्वर की ये इच्छा मंजूर नही थी। मोती की आँखों से झर झर आंसू बहने लगे। रमलू मोती का हाथ पकड कर उसे बैलगाड़ी की और खिचता हुआ ले जाने लगता है। लेकिन मोती के दिमाग में तो कुछ और ही चल रहा था।
मोती रमलू से अपना हाथ छुड़ा कर तेज़ी से स्वामी महाराज की और दोड़ता है। और जाकर उनके चरणों में गिर जाता है। स्वामी महाराज के शिष्य उसे खीचने लगते है। लेकिन उसकी पकड़  मजबूत थी एक मेहनतकश इंसान की पकड़ को छुड़ाना संयासिओं के बस में कहाँ रमलू दूर खड़ा सब तमशा देख रहा था।
“स्वामी महराज की आँखे खुलती है। ये सब क्या है। मूर्ख छोडो मेरे चरण।”
“नहीं महाराज, मैं आपके चरण तब तक नही छोडूंगा जब तक आप मेरे गाँव चलने के लिए हामी नही भर देते।”
“और अगर मैंने हामी नही भरी तो।”
“तो मैं यही आपके चरणों में भूखा प्यासा प्राण दे दूंगा।”
“स्वामी महाराज ने क्रोध भरी आँखों से रमलू की और देखा।”
“रमलू भागा भागा आया और मोती की बाह पकड़ कर उसे अलग करने लगा।”
“मोती ये क्या तरीका है? ऐसे साधू संतों को कौन परेशान करता है। चलो यहाँ से।”
“नही बाबा, मैं यहाँ से बिना स्वामी महाराज के नही जाने वाला उनके बिना तो यहाँ से मेरे प्राण ही जा सकते है।”
यह सुन कर स्वामी महाराज बहूत जोर से हँसे। उनकी हंसी देख सभी हकेबके रहा गए। स्वामी महाराज ने दोनों हाथों से मोती को उठाया।
“पता नही तुमने मुझमे ऐसा क्या देखा की तुम मुझे अपने गाँव ले जाने के लिए अपने प्राणों की भी आहुति देने की तैयार हो गये। चलो मैं तुम्हारे लिए अपने प्रण को तोड़ देता हूँ। मैं अपने सभी शिष्यों के साथ संध्या समय में तुम्हारे गाँव आऊंगा।”
“महाराज आज तक मैंने अपने जीबन में जितनी भी ख़ुशी प्राप्त की है ये उन सब में सबसे बड़ी ख़ुशी है।” रमलू नेदोनो हाथ जोड़ कर स्वामी महराज से कहा।
“मोती तुम गाँव जाओ और स्वामी महाराज के आगमन की तयारी करो और हाँ गाँव में मुनादी भी करा देना मैं स्वामी महाराज के साथ आऊंगा।”
मोती ने स्वामी महराज के चरण स्पर्श किये और चला गया।
"महाराज  ने आज तक किसी भी भक्त के ऐसे अनुरोध को स्वीकार नहीं किया। फिर आज कैसे "
शिवा नन्द ने अपने साथी गुरुभाई रघुबीर से पूछा।
"मैं क्या जानू, शायद प्रभु की कोई लीला हो उस परमपिता के खेलो को तुम और हम क्या जाने भाई"
रघुबीर ने बड़े भोलेपन से जवाब दिया।
"हाँ रघु ये तो तूने सही कहा, कौन जाने इसे अन्तर्यामी के मन में क्या है"
उधर मोती गाँव पहुंचता है और मुनादी वाले को बुला कर पुरे गाँव में घोषणा करवा देता है की स्वामी महाराज ने गाँव में आने की हामी भर ली है।
सूरज धीरे-धीरे अपने घर की ओर वापसी कर रहा था। पंछी एक के पीछे एक कतार में अपने घर की ओर लौट रहे थे जाते हुए सूरज की लालिमा चारों ओर आकाश में फैल चुकी थी। लाल रंग का आकाश अपनी मनोहर छठा से सबको मोहित कर रहा था। पश्चिम से आती हुई ठंडी ठंडी हवाओं ने मौसम को खुशनुमा बना रखा था। रात के स्वागत में संध्या बाहें फैलाये बेताब थी। ऐसे ही माहौल में स्वामी महाराज का कारवां गांव के द्वार तक पहुंचा सबसे आगे स्वामी महाराज थे। उनके बराबर में रमलू स्वामी महाराज के पीछे उनके चार प्रमुख शिष्य गोस्वामी, नंदराम, भोला और विष्णु थे। उसके बाद स्वामी जी के सभी शिष्य दो की कतारों में एक के बाद एक बड़े अनुशासन से चल रहे थे। लगभग मध्य में  शिवा और उसके पीछे उसका मित्र रघु थे। जैसे ही कारवां गांव में प्रवेश हुआ। गांव के मुख्य द्वार पर बहुत भरी भीड़ थी। जो स्वामी महाराज के दर्शन के लिए  खड़े थे। इतनी भीड़ देखकर स्वामी महाराज आश्चर्यचकित हो गए उन्होंने रमलू से पूछा।
“क्या यह  गांव कितना बड़ा है। यहां पर कितने लोग रहते हैं।”
रमलू ने प्रसन्न मुख से जवाब दिया
“नहीं महाराज यह सभी लोग तो आपके आगमन का समाचार सुनकर आस-पास के गांव से इकट्ठा होकर आए हैं।”

गांव के मुख्य रास्ते के दोनों तरफ लोगों की भारी भीड़ जमा थी। मुख्य द्वार के समीप बीच रास्ते में एक बुजुर्ग इंसान दोनों हाथ जोड़े अपने घुटनों पर था। जैसे खुद स्वामी महाराज गांव में प्रवेश किय वह बुजुर्ग  आंखों में आंसू लिए स्वामी महाराज के चरणों में गिर गया। उसे देख कर वहाँ खड़ी भीड़ में सभी स्वामी महाराज को दंडवत प्रणाम करने लगे।

“महाराज कितने वर्षों के इंतजार के बाद आपने आज दर्शन दिया।” उस बुजुर्ग ने स्वामी महाराज से कहा।
स्वामी महाराज ने दोनों हाथों से उस बुजुर्ग को उठा लिया और अपने गले से लगा लिया। स्वामी जी  भावुक  हो गए उनकी आँखों से आंसू झर झर बहने लगे। महाराज ने रमलू से कहा “अगर मुझे मालूम होता की इस गाँव में मुझे इतना प्रेम मिलेगा तो मैं स्वयं ही यहाँ आ जाता यदि मैं आज इस गाँव में नही आता तो मुझे इतना पाप लगता की जो मेरे सभी पुण्यों को एक ही  क्षण में भस्म कर देता। “

 स्वामी महाराज धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे थी। कच्चे रास्ते पर दोनों तरफ लोग अपने घरों के बाहर हाथ जोड़े टकटकी लगाए खड़े थे। उस कच्चे रास्ते पर गांव के लोगों ने पानी का छिड़काव कर दिया था। मिटटी की भीनी भीनी गंध मन को प्रफुल्लित कर रही थी। बरसात के बाद गर्मी लगभग समाप्त हो चुकी थी। सर्दी का मौसम आने वाला था। शाम के समय हल्की हल्की सर्दी ने मौसम का आनंदमय बना दिया था। गांव की उस पगडंडी के चारों तरफ लोगो का हुजूम लगा था।
पुरुष स्त्रियाँ बच्चे बुजुर्ग सभी इस भीड़ मे शामिल थे। हर कोई बस  महाराज की एक झलक पाना चाहता था। सभी लोग दोनों हाथ जोड़ कर स्वामी जी को नमन कर रहे थे और स्वामी महाराज उन्हें आशीर्वाद देते हुए आगे बढ़ रहे थे।
कुछ दूरी के बाद एक घटना घटी भीड़ से निकल कर छोटी सी बच्ची अपने नन्हें पैरों से दौड़ती हुई अचानक रघु के पास आ गई और चलते हुए रघु  के केसरिया चोले को खीचने लगी।  जैसे ही रघु ने उस बच्ची की और देखा उस बच्ची ने  दोनों हाथ रघु की और बढ़ा दिए जैसे कुछ कह रही हो रघु ने उस बच्ची को गोद में उठा लिया। इस छोटी सी बच्ची ने अपने नन्हें नन्हें हाथों से रघु की गर्दन को दबोच लिया और बहुत कस के उसने रघु को पकड़ लिया उस बच्ची के पीछे उसकी मां दौड़ी दौड़ी आई और कहने लगी।
 “क्षमा करे बाबा कुछ समय पहले इस बच्ची के पिता हमें छोड़कर न जाने कहां चले गए। ये उनको बहुत याद करती है  और जब भी किसी अजनबी इंसान को देखती है। उसे अपने पिता समझकर उससे इसी प्रकार लिपट जाती है।”

बच्ची की मां उसे खींचकर  अलग करने की कोशिश करने लगी। लेकिन बच्ची पूरी ताकत से रघु को पकड़े हुई थी। और बाबा बाबा कह रही थी। शायद अपने पिता को याद कर रही थी। “इतनी प्यारी बच्ची को छोड़ कर कौन जा सकता है।” रघु मन ही मन बुदबुदाया।
 थोड़ी सी मेहनत के बाद बच्ची की मां बच्ची को अलग करने में सफल हो गयी। बच्ची बहुत  जोर जोर से रोने लगी।
उस बच्ची का रोना देख कर रघु का मन द्रवित हो रहा था। उसकी आँखों में पानी था।
“रघु चलो   करवा आगे निकला रहा है। शिवा ने रघु से कहा।  जिसने न जाने क्यों अपने चेहरे को ढक रखा था।
रघु  आगे बढ़ा  पर शायद उसका मन उस बच्ची के ही पास रह गया था। वह  बार-बार मुड़कर  उस बच्ची को देख रहा था। इस नज़ारे को करवा के हर इंसान ने देखा स्वामी महाराज ने भी । करवा गाँव के बाहर मंदिर तक पहुच गया। जहाँ स्वामी महाराज के स्वागत का पूरा इंतजाम था। महाराज के लिए एक ऊँची सी जगह तैयार कर रखा थी।
“महराज गाँव वाले चाहते है की आप उन्हें ज्ञान के दो शब्द दे।”  रमलू ने स्वामी महराज से आग्रह किया।
चेहरे पर हलकी सी मुस्कान लिए स्वामी महाराज ने कहना शरू किया।

“क्या आप लोग मुझे ज्ञानी समझते हो, आज से पहले मैं भी अपने आपको बहुत ज्ञानी समझता था। किन्तु मुझसे ज्यादा ज्ञानी तो आप लोग हो जो प्रेम के महत्व को जानते हो। ये मोती, मुझसे ज्यादा ज्ञानी है। जो आप लोगो के प्रेम के लिए, अपनी स्त्री के प्रेम के लिए मुझे यहाँ लाना चाहता था। वो छोटी सी बच्ची मुझसे ज्यादा ज्ञानी है। आज इस गाँव में आने से मुझे एक बात स्मरण हो आई है। मेरे गुरु अक्सर ईश्वर  प्राप्ति का एक सरल मार्ग बताया करते थे। लकिन समय के साथ मेरे अंदर जो अहम पैदा हुआ था। उसकी वज़ह से  मैं उस मार्ग को भूल गया। आज मोती की वज़ह  से मैं इस गाँव में आया हूँ और मुझे अपने गुरु की वो बात स्मरण हो आई। और वो ये है की यदि तुम सच्चे मन से ईश्वर  को प्राप्त करना चाहते हो  तो उसे पाने का एक मात्र सरल उपाय है ‘प्रेम’ ये जो मोती है। वो मुझे से या मेरे किसी भी शिष्य से ज्यादा इस बात को जानता है। जो केवल अपनी पत्नी के एक आग्रह पर मुझे इस गाँव में लेन के लिए अपने प्राण भी देंने को तैयार हो गया था। इसने मुझे आज एक बहुत बड़े पाप से बचा लिया अगर मैं आज आप सब के सम्मान और प्रेम को बिना पाए इस गाँव से चला जाता तो मैं एक बहुत  बड़े पाप का भागी बन जाता। और उस छोटी से बच्ची के प्रेम ने भी मेरा मन द्रवित कर दिया। जिसका पिता उसे मात्र इसलिए छोड़ गया की उसके पिता को ईश्वर  को पाना है। और वो मुर्ख ये भी नही जानता  की ईश्वर  तो उसके घर में ही हैं।  आप ही बताये की क्या इस प्यारी से बच्ची के  प्रेम को यदि आप ठुकराते है। तो ईश्वर  आप को स्वीकार कर लेगा।” “लेकिन प्रभु आपको कैसे पता की इस बच्ची के पिता ने ईश्वर  की प्राप्ति के लिए हमे छोड़ा है?”
उस बच्ची की माँ ने सवाल किया।
“बेटी इसका पता भी तुम्हे अभी चल जायेगा।”

“प्रेम और मोह में बहुत फर्क है। उस बच्ची के ह्रदय में जो है वो प्रेम है। अपने पिता के लिए और उस बच्ची के पिता के ह्रदय में ईश्वर  के लिए जो है वो मोह है।”
“प्रभु दोनों में क्या अंतर है।” शिवा ने महाराज से पुछा।
“मुझे पता था, शिवा  की तुम ये सवाल अवश्य पूछोगे।”
ये शब्द सुनकर शिवा  का सर स्वत ही नीचे झुक गया। जैसे उसकी चोरी पकड़ी गयी हो।

“बहुत बड़ा अंतर है। प्रेम निश्चल होता है। प्रेम किस को त्यागता नही, प्रेम तो सिर्फ जोड़ने का नाम है। जबकि मोह स्वार्थी होता है। वो केवल अपना फायदा सोचता है। इस स्रष्टि में ईश्वर  को पाने का एक मात्र तरीका है प्रेम सब से प्रेम करो निस्वार्थ।”

जब संत्संग समाप्त हो गया तो शिवा  आँखों में आंसू लिए स्वामी महाराज के पास गया|
“महराज एक प्रश्न है।” शिवा ने दीन भाव से स्वामी महाराज से प्रार्थना की।
मुख मंडल पर हलकी सी मुस्कान लिए स्वामी महाराज ने कहा।
“यही न की मुझे कैसे पता चला की तुम ही उस नन्ही सी बच्ची के पिता हो।”
शिवा कुछ बोल न सक बस एक छोटे बालक की तरह स्वामी महाराज के मुख को देखता रहा।
“जंगल में तुमने बताया था। की तुम्हारा गाँव आस पास ही है। जब से हमने गाँव में प्रवेश किया है। तुम अपना मुख छिपाए हुए थे। और सबसे बड़ी बात जब वो बच्ची रघु के पास आई थी। उस वक़्त तुम्हारी आँखों में उस बच्ची के लिए जो वात्सल्य, प्रेम और करुणा थी, वो केवल एक पिता की आँखों में ही हो सकती है।”
“हे प्रभु मुझे माफ़ करना मैंने आपसे झूठ बोला था। की मेरे परिवार में कोई नही है। लेकिन मेरी इच्छा मात्र ईश्वर  को प्राप्त करने की थी।”

“जो इंसान झूठ बोलना नही जानता उसका झूठ आसानी से पकड़ा जाता है। तुम्हारा झूठ तो मैंने उसी दिन पकड़ लिया था। जब तुम पहली बार मेरे पास आये थे। किन्तु तुमने वो झूठ एक अच्छे काम के लिए बोला था।”
“किन्तु महराज मैं सच्चे मन से ईश्वर को प्राप्त करना चाहता हूँ।“
स्वामी जी जोर से हँसे।
“मूर्ख  जो इंसान अपने कर्तव्यों से भागा हो, तो तुम्हे क्या लगता है क्या वो कभी ईश्वर  को प्राप्त हो सकता है। क्या उस छोटी सी बच्ची के प्रेम में ईश्वर  नही है। ईश्वर तो इस संसार के कण कण में मोजूद है। किसी के प्रेम को ठुकरा कर तुम कैसे ईश्वर  को प्राप्त हो सकते हो।
लेकिन प्रभु भगवन गौतम बुध ने भी तो ईश्वर  प्राप्ति के लिए घर त्याग दिया था।
बिल्कुल क्योकि उनके ,मन में ईश्वर  को पाने के एक तड़प थी। ईश्वर  के लिए उनका प्रेम उनके प्रति उनके परिवार के प्रेम से कही अधिक शक्तिशाली था। किन्तु तुम्हारी बेटी इस मामले में तुमसे आगे है।  तुम अपने हृदय से महसूस करके बताओ की क्या ईश्वर  के प्रति तुम्हारा प्रेम तुम्हारी बेटी के उस प्रेम से ज्यादा गहरा है? जो वो तुमसे करती है। शिवा तुम इसे आदेश मानो, सलाह मानो या फिर मेरी विनती, स्वामी महाराज ने शिवा के सम्मुख हाथ जोड़ कर कहा।”
“नही आप मेरे गुरु हो प्रभु आप आदेश दो।” शिवा स्वामी महाराज के चरणों में गिर पड़ा।
“तुम अपनी बेटी के पास लौट जाओ।” ये ही मेरी इच्छा हैं।
शिवा की आँखों से निरंतर आंसू बह रहे थे। स्वामी महाराज के चरणों को उसने अपने आंसुओ
“जाओ बेटा अब अपनी बेटी के पास लौट जाओ वो ही तुम्हारे लिए ईश्वर प्राप्ति का मार्ग है।“  

भीड़ में से वो छोटी से बच्ची दौड़ी आई और आकर उसने पीछे से शिवा की गरदन को पकड़ लिया।  उसके आलिंगन से शिवा के ह्रदय में एक तरंग से फ़ैल गयी। मस्तिष्क को शून्य का एहसास होने लगा। उस क्षण शिवा को लगा की स्वामी महाराज की कोई भी बात असत्य नही हो सकती। वाकई इस मनमोहक प्रेम को छोड़ कर भला कैसे कोई ईश्वर को प्राप्त कर सकता है। ये ही तो ईश्वर का आलिंगन है, और मैं इसे पुरे संसार में ढूंढ रहा था।  





Thursday, July 7, 2016

जन्मभूमि का क़र्ज़

【 जिसकी मिट्टी में खेल कर मैं बड़ा हुआ आज उसे ही नष्ट करने का उसे आदेश मिला है, क्या यह देशभक्ति है।】

रहमतुल्ला खान पाकिस्तान एयरफोर्स में पायलट के पद पर थे। उनका जन्म राजस्थान के एक छोटे से गांव बन्दया में हुआ था। जहां से 1947 में बटवारे  के कारण उन्हें पाकिस्तान आना पड़ा यहां की ज़मीन उससे भिन्न थी । जँहा  उन्होंने अब तक अपना जीवन गुज़ारा था । लेकिन बालक मन जल्द ही पाकिस्तान को अपना वतन मान लिया। वतनपरस्ती उनकी रगों में बस चुकी थी इसीलिए देश का कर्ज चुकाने के लिए ही एयरफोर्स जॉइन की आज वो एक फाइटर प्लेन के पायलट हैं ।

सन 1965 भारत पाकिस्तान के बीच एक युद्ध शुरू हुआ, रहमतुल्ला खान को इस युद्ध के लिए चुना गया । उस वक़्त पायलट  की गिनती उंगलिओ पर होती थी इसलिए रहमतुल्ला खान पाकिस्तानी सेना के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण इंसान थे। उन्हें राजस्थान के बॉर्डर पर भेज भेजा गया ।जहां उनका जो स्वागत किया गया वो अगर  किसी राजा के बराबर नही तो उससे कमतर भी नही था। बॉर्डर से थोड़ी ही दूरी पर इस  कैंप में सीमा पर पाकिस्तान ने अच्छी फोर्स लगा रखी थी। सर्दी का मौसम था कैंप के पास सभी आग जलाकर बैठे थे। चारो और गुप अँधेरा था । संत्री अपनी अपनी ड्यूटी पर मुस्तैदी से तैनात थे।सर्द हवाएं इंसान के जिस्म में घुस कर खून को शिथिल करने का दम रखते थी। लेकिन आग की तपिश ने उनके असर को कम कर रखा था। सैनिको के अस्थायी टेंटों से घिरे सभी बैठे हुए थे। बातों का दौर चल रहा था । पुरानी यादों के झरने बह रहे थे। हर कोई दूसरे के गम और ख़ुशी में शरीक था।

" जनाब एक बात समझ में नहीं आती। हमारी सब की मिटटी एक ही है फिर भी हम लोगो ने अलग अलग मुल्क बना लिए ऐसा क्यों ?" एक सैनिक ने रहमत की और इशारा करते हुए पूछा।

"आमिर इस क्यों का ही जवाब आज तक कोई नही ढूंढ पाया। ऐसे न जाने कितने क्यों है , जिनके अगर जवाब मिल जाते तो न जाने कितने बड़े बड़े युद्ध बिना लड़े ही ख़त्म हो जाते।" रहमतुल्ला ने सैनिक के सवाल का जवाब बड़े ही दार्शनिक अंदाज़ में दिया।

रहमतुल्ला-"मुल्क बाटने का सबसे बड़ा कारण जानते हो क्या है ।"
जवाब ने वह बैठे सभी सैनिकों ने नही इंगित करने वाली मुद्रा में सिर हिला दिया।

रहमतुल्ला- "शायद कुछ लोगो को अपने उस संघर्ष की कीमत चाहिए थी , जो उनकी नजरो में उन्होंने देश की आज़ादी के लिए किया था। जबकि वास्तव में आज़ादी पाने में उनका कोई योगदान नही था।"
तभी एक सैनिक ने रहमत से  पूछा ।

"जनाब आप आजादी से पहले कहां रहते थे, सरहद के इस पार या उस पार।"
"हम्म उस पार, शायद राजस्थान में , गांव का नाम मुझे अच्छे से याद नहीं है, मैं बहुत छोटा था यही कोई 8 या 9 साल का जब हमने गाँव छोड़ दिया था ।"

"क्यों "
किसी ने सवाल दागा।

रहमत-  "मेरे अब्बू क्रांतिकारी थे l उन्हें अपने देश से बहुत प्रेम था। देश की आज़ादी की जंग में किसी पुलिस फायरिंग में उनकी मौत हो गई और उनकी मौत के बाद मेरी अम्मी  हम भाइयों को लेकर मेरे मामू के यहां आ गई । और उसके कुछ ही दिनों के बाद इस देश के टुकड़े कर दिए गए और हमे यंहा आना पड़ा। क्योकि मेरे मामू को लगता था की पाकिस्तान उनके लिए बेहतर है। लेकिन मेरा गांव मुझे आज भी याद आता है। खासकर हमारे गाँव का वो बरगद का पेड़ जिसके नीचे मैं अपने दोस्तों के साथ खेलता था। उस पेड़ के चारों तरफ मिटटी का चबूतरा बना था।जिसकी सौंधी सौंधी खुशबू आज भी मेरे मन को सुगन्धित करती है। वो हमारे गाँव की खुशहाली का प्रतिक था । हर धर्म का व्यक्ति उसके नीचे इकट्ठा होता था। और वो वृक्ष अपनी छाया देने से पहले किसी से नही पूछता था की उसका धर्म क्या है या वो कोन सी जाती का है। धर्म ,राजनीती ,आर्थिक सभी नीतियों पर  लोग वहां बैठकर कर वहां चर्चा करते थे। वो बुजुर्ग अनपढ़ थे, फिर भी उनके ज्ञान की कोई सीमा नही थी। प्रेम और सम्मान उन लोगो के अंदर कूट कूट कर भरा था।"

"आमिर जानते हो मेरी दिली ख्वाईश क्या है।"
रहमत ने एक लम्बा सांस लेते हुए। नज़र को अथाह काले आसमान पर टिकाते हुए पूछा।

' क्या '
आमिर का छोटा सा सवाल।
आमिर भी रहमत के उस कल्पना लोक में खो चूका था । जहां इस वक़्त रहमत दुनिया से बेखबर पर्यटन कर रहे थे।

एक अज़ीब सा आकर्षण होता है बचपन में एक अदभुत खिंचाव जो शायद गरूत्वाकर्षण से भी ज्यादा शक्तिशाली होता है। इंसान कभी भी इस खिंचाव से दूर नही हो पाता।बचपन का आनंद ऐसा रस होता है। जिसका स्वाद कभी भी आत्मा रूपी जिव्हा से नही जा पाता, चाहे इंसान कितना भी प्रयत्न कर ले। ऐसा ही कुछ रहमत के साथ भी हो रहा था। वो भी एक ऐसे वातवरण में खो गया था । जहां वो न मुसलमान था न हिन्दू, ना उसे हिंदुस्तान का मतलब पता था और नही पाकिस्तान का । ये समझदारी भी कितनी भयानक चीज़ है । समझदारी आने पर इंसान सबसे पहले इंसान से दूर जाता है कारन चाहे देश हो या धर्म या कुछ और। इन्ही खयालो के भवर में रहमत बहे चला जा रहा था ।की°••••••
'बताओ न हुज़ूर'
एक दूसरे सैनिक के सवाल ने उनकी तन्द्रा को भंग कर दिया।

"हनम्म्म" रहमत जैसे किसी नींद से जाग गए हो।
"मेरी दिली ख्वाईश है, की एक बार मरने से पहले अपने उस गांव मे जरूर जाऊ। वहां की मिटटी की चूमू, उस मिटटी को अपने बदन पर लपेट कर पूरे गाव् में भागता फिरू, उस मस्जिद को सज़दा करु जहां मैं अपने अब्बु के साथ जाया करता था, उस बरगद के पेड़ को आलिंगन करूँ उसकी डाली से लिपट कर ऐसे लेटा रहूँ जैसे मैं बचपन में लेटता था।"

"पर जनाब क्या ये संभव है"

"पता नही अल्लाह की क्या इच्छा है।"

इतना कहकर रहमत शायद पुरानी यादों में खो गए रात का अंधेरा गहराने लगा ठंड भी धीरे धीरे  बढ़ने लगी थी।आग की तपिश धीरे धीरे सर्द हवाएँ के झोंको के आगे बेबस सी नज़र आने लगी थी। बढ़ी हुई ढंड ने सभी को  अपने टेंट की और जाने को मजबूर कर दिया।

रहमत भी अपने टेंट में जा कर सो गए । जिस सीमा पर रहमतुल्ला को तैनात किया गया था । वहाँ इंडियन आर्मी अभी नहीं आई थी मात्र कुछ जवान ही बॉर्डर पर तैनात थे।
अगली सुबह
रहमतुल्ला खान के ऑफिसर ने उन्हे याद किया।और उन्हें आदेश मिला की भारत की सीमा के अंदर जाकर बम गिराने है। रहमतुल्लाह तुरंत तैयार हो गए और अपने हवाई जहाज को लेकर भारतीय सीमा में प्रवेश कर गए उन्हें आदेश था की उन्हें जल्द ही अपना काम खत्म कर वापस आना है  क्योकि रात के अँधेरे में वो प्लेन  काम करने लायक नही थे।

अपना प्लेन लेकर रहमतुल्लाह भारतीय सीमा में प्रवेश कर गया उनका प्लेन आग बरसाने लगा । रास्ते में आने वाले सभी भारतीय बंकरों को उन्होंने उड़ा दिया उनके बमो की वर्षा ने भारतीय सैनिको को अचरज में डाल दिया । रहमतुल्ला का प्लेन लगभग 3-4 किलोमीटर अंदर आ जाता है। अचानक उनकी निगाह नीचे पड़ती है  एक बरगद का पेड़ जिसके चारों तरफ कुछ बच्चे खेल रहे है। बच्चे उस प्लेन को देखकर ताली बजाने लगते है। रहमतुल्ला का हाथ बम गिराने वाले बट्टन पर ही था । बच्चों की ताली ने जैसे रहमत के मन के किसी कोने को झकझोर दिया। रहमतुल्ला खान की धुंधली यादें के कुछ पुराने चित्र नए रूप में उभरने लगे हर एक दृश्य उन्हें स्पष्ट नजर आने लगा यह वही बरगद का पेड़ है जिसके नीचे कभी रहमतुल्ला खान खेला करता था । उन बच्चों के बीच उन्हें अपना बचपन दिखने लगा।

"अरे वही गांव है । जहां मैंने जन्म लिया था वही गांव जिसकी मिट्टी में खेल कर मैं बड़ा हुआ ।"

रहमतुल्लाह वो दिन याद आने लगे जिन्हें कोई भी मनुष्य चाहकर भी नहीं भुला पाता जेठ के दुपहरी में मैं अपने दोस्तों के साथ  इस  पेड़ के नीचे खेलता था और वापसी में घर जाकर अब्बा जान से डांट खाता था।  रहमतुल्ला खान को जो ऑपरेशन दिया गया था उसके अनुसार उन्हें इस गांव में बर्बादी फैलानी थी जिससे इंडियन आर्मी दूसरी जगह से हटाकर यहां भेज दी जाए और दूसरी जगह पाकिस्तानी आर्मी कब्ज़ा जमा सके। रहमतुल्ला खान का दिमाग बार-बार इस बात को दोहरा रहा था की उसका कर्म है इस जगह बम गिरना ।मगर उसका ज़मीर उसे आगे ही नही बढ़ने दे रहा था। बचपन की यादों ने उनके पैरों में जंजीर डाल दी थी । बच्चों के खेल ने  उसकी यादों का जाल बनाकर रहमत को बांध दिया था उनके दिल को अपने वश में कर लिया था।

रहमत का हाथ  अभी भी उस बटन पर था, जो एक ही झटके में तबाही का तूफान इस गाओं पर गिरा सकता था। हवाई जहाज गांव के चारों तरफ घूम रहा था, गांव के बच्चे जहाज को देख कर खुश हो रहे थे  उन मासूमों को इस बात का जरा सा भी अंदाज़ा नही था कि यह जहाज आज उनकी मौत का पैगाम लेकर आया है। रहमतुल्ला खान चाहकर भी उस बटन को नहीं दबा पा रहा था। उसकी आत्मा बार बार उससे पूछ रही थी की इन निर्दोष  बच्चों को मारना क्या देशभक्ति है। आखिर ये  गांव ही तो उसकी जन्म भूमि है और जन्मभूमि मां के समान होती है। मां से दूर जाने वाला बच्चा क्या अपनी माँ की छाती को खून से लाल कर सकता है । कुछ लोगों ने अपने थोड़े से फायदे के लिए धर्म के नाम पर हिंदुस्तान पाकिस्तान बना दिए लोगों को इस्लाम का वास्ता देकर हिंदुस्तान का दुश्मन बना दिया गया। क्या अपनी जन्म भूमि को नष्ट करना इस्लाम की किसी किताब में लिखा है क्या निर्दोषों को मारना कहीं भी इस्लाम के नियमों में लिखा है। मैं एक सच्चा मुसलमान हूं और एक सच्चा मुसलमान कभी भी अपने जन्म भूमि के साथ दगा  नहीं कर सकता दिल की बातें मन ने मान ली।  पर  दिमाग अभी भी संघर्ष  कर रहा था अब तो मेरा वतन पाकिस्तान है। उसके प्रति मेरा कर्तव्य है। और उस कर्तव्य की पूर्ति के लिए मुझे ये जंग लड़नी है । इसका जवाब भी आत्मा के पास था यदि इस धरती के लोग  मेरे वतन को नुकसान पहुंचाते हैं । तो इन्हें नष्ट करना मेरा फर्ज है । लेकिन ये मासूम तो अपने खेल में व्यस्त है। ये मेरे देश का क्या नुकसान करेगे।अब मैं ऐसा नहीं कर सकता ये मासूम बच्चे जिन्हें मैं अभी नष्ट करने वाला करने वाला था। जिनको मैं तबाह करने वाला था उन्होंने मेरा या मेरे देश का कोई  नुकसान किया है नहीं ।

आखिरकार आत्मा विजयी हुई रहमत  ने अपने प्लेन को कैंप की ओर मोड़ दिया।
कैम पहुंचकर ऑफिसर ने पूछा
"रहमतुल्ला खान तुमने इतनी जल्दी  अपने ऑपरेशन को अंजाम दे दिया सुभानल्लाह"

"सर मैं ऐसा नहीं कर पाया रहमतुल्ला खान ने जवाब दिया"

" क्या क्या कहा तुमने तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं है जानते हो तुम क्या कह रहे हो।"
ऑफिसर ने क्रोध भरे लहजे में पूछा।

"जी मैं बिल्कुल जानता हूं।"

" लेकिन क्यों क्यों।"

"इस क्यों का जवाब मैं नहीं जानता,शायद ये वही क्यों है। जिसका जवाब दोनों देश की आवाम जानना चाहती है, की क्यों पाकिस्तान बना , और क्यों हिंदुस्तान पाकिस्तान बिना किसी कारण के एक दूसरे के दुश्मन बन गए। साहब क्या आपके पास है इस क्यों का जवाब"

"मैं यहां तुम्हारा लेक्चर सुनने नही आया हूँ, मत भूलो रहमत तुम एक फौजी हो, कोई दार्शनिक नही । तुम्हे अपने दिल का नही दिमाग का इस्तमाल करना चाहिये।"

"पर जनाब कभी कभी दिमाग दिल के सामने टिक नही पाता"

उसके बाद ऑफिसर ने रहमत को  बहुत कुछ कहा लेकिन वो चुपचाप खड़े सुनते रहे ।
अंत में
"ठीक है अब की बार मैं तुम्हारे साथ चलूँगा, शायद तुम्हे मालूम नही रहमत ये ऑपरेशन हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण है"

दोनों फाइटर प्लेन में सवार होकर उसको चल देते हैं गांव के पास पहुंचकर ऑफिस रहमतुल्ला का आदेश देते हैं

"ओके अब बम गिराओ "
लेकिन आदेश के प्रति कोई प्रतिक्रिया नहीं होती ।

"रहमतुल्ला खान सुना नहीं तुमने ,बम गिराओ ऑफिसर ने चिल्ला कर कहा।"
रहमतुल्लाह बटन पर हाथ रख देते हैं जिसके दबने से वह गाओं पल भर में राख के ढेर में तब्दील हो जायेगा।

"बम गिराओ रहमत" ऑफिसर चिल्लाता है।

रहमतुल्लाह कुछ भी नहीं कर रहे थे
"तुम्हे हो क्या गया है" ऑफिसर ने पूछा

"मैं नही जनता, पर मैं इस गांव पर बम नही गिरा सकता" रहमत का संक्षिप्त जवाब था।

"पर क्यों"

"ये गांव मेरी जन्मभूमि है। और मैं अपनी जन्मभूमि को अपने हाथों से बर्बाद नहीं कर सकता"

वो बात तो सही है रहमत लेकिन अब ये हमारा मुल्क नही है। और न ही यह के लोग हमारे भाई बहन अब ये हमारे दुश्मन है।

"सर कुछ लोगो ने अपने जरा से फायदे के लिए धर्म के नाम पर दो देश बना दिए क्या देश बाटने से मेरी जन्मभूमि भी बदल गयी जिस मिटटी पर मैं पैदा हुआ जिसमे ऊगा हुआ अनाज खाकर आज मैं इस काबिल हुआ की ये जहाज़ उड़ा सकूँ। अब जवान होकर मैं इसी धरती की छाती को लाल कर दूँ।  क्या मैं आज उन लोगो पर बम गिरा दू, जिनके साथ खेल कर मेरा बचपन गुजरा है। जिन लोगो ने बुरे वक़्त में मेरी अम्मी को संभाला , आज मैं उन सब लोगो का काल बन जाऊ सिर्फ इस लिए की मेरी वर्दी में दो चार तमगे जुड़ जाये नही हुजूर नही , रहमतुल्लाह खान इतना बेगैरत नही हो सकता। रहमत क्या कोई भी सच्चा मुसलमान इतना बेगैरत नही हो सकता।"

"लेकिन रहमत अब तुम पाकिस्तानी हो और ये हिंदुस्तान है बम गिरना तुम्हारा कर्तव्य है एक सच्चे मुसलमान का धर्म है।" अब ऑफिसर ने अपना काम निकलने के लिए धर्म का सहारा लिया।

"जनाब कोई भी सच्चा मुसलमान निर्दोषों को नही मार सकता और अगर मारता है। तो वो मुसलमान नही हो सकता"

"ठीक है अगर तुम नही कर सकते तो मैं करता हूँ।"
इतना कहते हुए ऑफिसर ने अपना हाथ बम गिराने वाले trigger पर रखा।

"गुस्ताखी माफ़ जनाब, ना मैं खुद ऐसा करूँगा न ही आपको करने दूंगा।" इतना कहकर रहमत ने ऑफिसर का हाथ पकड़ लिया और प्लेन को वापस कैंप की और मोड़ दिया।

"तुम इसका अंजाम जानते हो रहमत" ऑफिसर चिल्लाया।

"मौत से बड़ा भी अंजाम होगा तो भी रहमत भुगतने के लिए तैयार है।"

छोटे छोटे बच्चे प्लेन को देख कर अभी भी उछल उछल कर तालिया बजा  रहे थे। रहमत को उन हँसते खेलते बच्चों को देख कर बड़ी ख़ुशी हो रही थी।

इस घटना के बाद रहमत का कोर्ट मार्शल हो गया। पर रहमत अंदर से बहुत खुश था । वो जानता था की दुनिया में बहुत ही कम लोगो को जन्मभूमि का क़र्ज़ चुकाने का मौका मिलता है। और उसे वो मौका अल्लाह के रहमो कर्म से मिला जिसे उसने पूरी नेकनीयती से निभाया।

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Monday, December 28, 2015

प्रायश्चित

प्रायश्चित

जिन्दगी की परेशानिया कम ही नहीं  हो रही है, या यूँ कह सकते है की मैं उन्हें कम ही नहीं होने दे रहा । जो व्यक्ति परेशानियो के ही बीच रहना चाहता हो उसकी परेशानियो को कम भी कौन  कर सकता है । वो ही हाल मेरा भी है। अपनी समस्यों के समाधान को खोजता हुआ मैं हर शाम की तरह घर पहुंचा, घर की बेल बजाई लेकिन आज दरवाजा मेरी बीवी ने नहीं खोला और जिसने खोला उन्हें देखने की मुझे न तो कोई इच्छा थी न ही कोई उम्मीद !
मैं उनके पैर छु कर आगे बढ़ गया। अपने बेडरूम में पहुंचा ही था की निशा पानी लेकर आ गयी।
"ये कब आये ।"
"कौन।"
मैंने निशा की ओर अजीब सी नज़रों से देखा वो समझ गयी की अभी मैं किसी भी मजाक के मूड में नहीं हूँ।
"अच्छा बाबूजी।"
"1 बजे आये थे ।"
"किस काम से आये है ।"
मुझे क्या पता । निशा ने संछिप्त सा जवाब दिया और वापस जाने के लिए मुड़ी।
"ये तो पता होगा कितने दिन रहेंगे।"
"नहीं पता,तुम खुद क्यो नही पूछ लेते।" कह कर वो सीधे किचेन की ओर चली गयी।
और मैं अपने चहरे पर question marks की एक पोटली लिए खड़ा रहा ???????
मैंने ड्राइंग रूम की और झांक कर देखा । वो इन्सान मेरे बेटे के साथ खूब हस हस कर बाते कर रहा है । अचानक मुझे ऐसे लगा जैसे कोई मेरी सम्पति पर डाका डालने की कोशिश कर रहा हो।

मैं मन ही मन सोचने लगा एक तो ऑफिस की ये परेशानी और दूसरा ये परेशानियो का फिक्स डिपाजिट सारे के सारे मेरे ही खाते में  क्रेडिट होने थे ।
"सुनो आप फ्रेश हो लो मैं खाना लगाती हूँ।" निशा किसी जल्दबाजी में मेरे पास आई।
"मेरे लिए खाना यही ले आना ।"
"क्यों आज यहाँ क्यों ।"
"मैं चुप रहा ।"
"ठीक हैं।"
कह कर वो चली गयी।
आखिर वो यहाँ इतने सालो के बाद क्यों आये है। हमारे बीच सवांद बंद हुए काफी अरसा बीत चूका था । हालाँकि मुझे कमल से उनकी खबर मिलती रहती थी। वो बात अलग है की मुझे उनकी किसी भी खबर में कोई दिलचस्पी नहीं थी।

अचानक की पुरानी यादें फिर से मन को कचोटने लगी। जिन यादों से मैं पीछा छुड़ाने के लिए मैं अँधा बन दौड़ रहा हूँ , वो आज फिर मेरे सामने आकर खड़ी होगई।
"बाबु जी बुला रहे है।"
"कौन" मैं अनजान बना ।
"मैं नहीं आ रहा , कह दो मेरी तबियत ख़राब हैं।"
"ठीक है" कह कर वो चली गयी।
"मैं जानता हूँ उसकी तबियत क्यों ख़राब है। वो नहीं आएगा।"
drawingroom से बाबूजी की आवाज़ आ रही थी
एक छोटी सी मुस्कान मेरे चेहरे पर फ़ैल गयी।
"ये लो खाना खा लो।"
"तुम उनसे इतना दूर क्यों रहते हो ।"
उसने मुझसे खाना खाते हुए पूछा
"नहीं ऐसा कुछभी नहीं है"
"नहीं ,नहीं मैंने कई बार नोटिस किया है प्लीज बताओ ना।"
औरतों में ये बहुत बड़ी कमी होती है वो अपनी curosity पर काबू नही रख पाती।
"अरे कहा न ऐसा कुछ भी नही है"
"प्लीज ...." उसने बड़े प्यार से पूछा, उसके प्यार के लिए तो म सब कुछ छोड़ सकता हू। बुत अभी इस सवाल का जवाब मैं उसे नही दे सकता।
"फिर कभी बताऊंगा आज नहीं।"
"आप हर बार ये ही कह कर बात टाल जाते हैं|"
"अरे कह तो दिया वक़्त आने पे सब बता दूंगा।"

"क्यों अभी क्या दिक्कत है, अभी बताओ।" वो ज़िद पर उतार आई उसकी ये ज़िद बड़ी अछि लगती है। बिल्कुल बच्चों जैसा बर्ताव। उसकी ये ही कुछ बातें मुझे उससे प्यार करने पर मजबूर करती रही है।"
"खाना खाऊ या छोड़ दूं।" मैंने उसे झिड़क दिया क्योकि इस वक़्त मेरा दिमाग दिल की प्रिय बातों को भी सुनने को तैयार नही था।

"तुमसे तो कुछ भी पूछना बेकार है।"
इतना कह कर वह चली गयी।

ये एक ऐसा ब्रह्मास्त्र है जो पुरुषों को हमेशा बचा लेता है, स्त्रिओं से ये कभी खाली नहीं जाता, क्योंकि अच्छी पत्नी कभी भी अपने पति को भूखा नही रहने देगी। परन्तु इसके परिणाम बहुत ही भयंकर होते है और हुआ भी वही।
खाना खाने के बाद मैं लेट गया और दिमाग कम्पनी के पैसों के बारे में सोचने लगा ।
तभी आगमन हुआ श्रीमती जी का, चेहरा सुजा हुआ, गुस्से से लाल ,ना जाने क्यों जब भी मैं निशा को इस रूप में देखता हूँ । तो मुझे हंसी आने लगती हैं। लेकिन मैं सहनशीलता का परिचय देते हुए अपनी उस हंसी को रोक लेता हूँ उसने तकिये को उठा कर जोर से बेड पर पटका ।
"क्या हुआ।" मैंने साहस का परिचय देते हुए पूछा
"आपसे मतलब।"
"अरे कोई तो बात हुई होगी ।"
"कोई बात नहीं हुई।"
"विशु नही आया ।"
"वो आज बाबु जी के साथ ही सोयेगा।"
"ठीक हैं ।"
मैंने भी बात को ज्यादा बढ़ाना उचित नहीं समझा।

'बाबूजी' इस शब्द ने मेरे विचारों को पुन: u turn दे दिया और मैं पुन: उन विचारों के समंदर में डूबने लगा जिससे निकलने मे मुझे बरसों लग गए।

मेरे बचपन की हर शाम एक अनजाने डर के साये में गुजरती थी।
शाम को जब मेरे सब दोस्त खेल छोड़ कर इस खुशी से घर लौटते थे की उनके बाबू जी अब घर आएंगे मैं डरा शमा सा घर जाता था । मेरी और मेरी माँ की हर शाम एक डर चादर के साथ आती थी। मेरे बचपन की हर शाम दर्द से भरी हुई बीतती थी। एक डर की चादर शाम होते ही मेरी आत्मा को ढाँप लेती थी क्योंकि शाम पर अधिकार होता था। मेरे बाबू जी का मैं उस वक़्त ये नहीं जान पाया की शाम को ऐसा क्या हो जाता था, की मुझे उनमे इंसानियत नही दिखाई देती थी| उनके मुह से सिवाय गललियों के कुछ भी नहीं निकलता था और बिना गलती के भी माँ को सज़ा मिलती थी। जो छोटी मोटी नहीं होती थी हर माँ अपने बच्चों के लिए भगवान होती है उसकी पावन  गोद बच्चों के हर दुख का मरहम होती है मेरी माँ भी स्नेह का सागर थी जिसकी गोद मे सिर रख कर मैं अपने सब गुम भूल जाता था। लेकिन मेरा मासूम मन ये कभी भी नहीं जान पाया की मेरी माँ का ऐसा कोन सा अपराध था। जिसके लिए उन्हे हर रोज़ प्रताड़ित होना पड़ता था, कभी सब्जी मे नमक कम है , कभी नमक ज्यादा क्यो है, रोटी जाली क्यों है या रोटी कच्ची क्यों या मैं बाहर खेलता क्यों पाया गया अगर  कभी कुछ नही मिला तो पुरानी गलतियों को दोहरा कर उन्हे जानवरों की तरह पीटा जाता था। हो सकता है ये सब गलतियाँ सज़ा के लायक हो मेरे बाबू जी की नज़र मे लेकिन ये सब इतने बड़े आपराध नही हो सकते जिनके लिए किसी इंसान का हाथ ही तोड़ दिया जाए और मेरी अम्मा भी सच्ची भारतीय नारी किसी ने अगर पूछा भी तो की ये चोट कैसे लगी तो माँ का जवाब
"भइसिया ने मार दिया "
बेचारी भोली थी वास्तव मे सब को पता था उस भैंस का नाम।
वैसे उनके इस जवाब मे एक डर भी छिपा था की कोई उनके पति को गलत न समझे जब कभी मैं उनसे कहता “अम्मा बाबू जी क्यो तुमको मारते है बाबू जी गंदे है” । वो कहती  "न बेटा तोहार बाबूजी बहुत अच्छे है हमार ही गलती थी" आज तक ये समझ मे नही आया क्यो हमेशा माँ ही गलत हिति थी।
लेकिन बाबू जी से मेरी दूरी का असली कारण तो .................
ये ही सोचते सोचते नजाने कब मैं नींद की गोद मे सो गया पता ही नही चला|
मेरी माँ अपने हाथों से मुझे खाना खिला रही थी हर तरफ खुशी ही खुशी थी की तभी "डैडी उठो" विशु की मिट्ठी आवाज ने मेरा सपना तोड़ दिया।
विशु  मेरे दिल का टुकड़ा जीवन मे मुझे सबसे जादा खुशी उसके जन्म पे ही हुई थी। संतान इंसान को मिला भगवान का सबसे बड़ा गिफ्ट है। पता नही कैसे लोग अपने फूल जैसे बच्चों पर हाथ उठा देते है। एक उसकी हंसी ही तो है जो मेरे सारे दुखों को पल भर मे हर लेती हैं
"अले मेला राजा बेटा उठ गया।" मैंने उसकी तोतली आवाज़ मे पूछा। और उसे बाहों मे कस लिया उसने भी अपने छोटे छोटे हातों से मेरी गर्दन को दबोच लिया। फिर हुआ आगमन मेरी धर्मपत्नी का।
“ये लो चाय पी लो।"
"ओहो लगता है गुस्से की परत पिघल गयी"
"वो सब छोड़ो, ये बताओ की आपने मुझे अपनी प्रोब्लेम के बारे मे क्यो नही बताया।"
"problem कोनसी problem” मैंने अनजान बनने की कोसिश की
"अब बनो मत मुझे बाबूजी ने सब बता दिया|"
“अरे क्या बता दिया बाबूजी ने साफ साफ बताओं पहेली क्यो बुझा रही हो “ मैंने अपने तेवर बदले
“येही की तुम्हारा कोई client तुम्हारी कंपनी के 5 लाख रुपए ले कर भाग गया और वो पैसा अगर तुमने जमा नही किया तो कंपनी तुम्हारे उपर गबन का केस डाल देगी”

“क्या बकवास कर रही हो ऐसा कुछ भी नहीं है”
“ऐसा ही है बाबूजी मुझसे झूठ क्यो बोलेंगे, वो सिर्फ इसी लिए आए है यहा, तुम्हारी मदद करने” 
‘बहू’ बाहर से बाबूजी की आवाज़ आई
“जी बाबूजी कह कर निशा बाहर की और गयी”
ये सब बाबू जी को कैसे पता चला मैं सोच मे पड़ गया कौन है जो उन्हे ये सब बता सकता है
“कमल” अचानक मेरे मुह से निकला
वो ही एक कमीना है जो ये काम कर सकता है 
"कमल" मेरे बचपन का दोस्त था। हम दोनों ने एक साथ ही पढाई शरू की थी । मेरे हर राज का राजदार हर सुख दुःख का साथी।
जब मेरी शहर में नौकरी लगी थी तब उसके ही भरोसे मैं माँ को गांव छोड़ के आया था।
केवल दोस्ती ही ऐसा रिश्ता है जिसे मनुष्य अपने आप चुनता है। और मेरा तो ये मानना है की अच्छे दोस्त केवल किस्मत वालो को ही मिलते है और इस मामले में मै बहुत किस्मत वाला हूँ। कमल अच्छी तरह से जनता था की मैं उस घटना के बाद बाबूजी से कोई संपर्क नही रखना चाहता ।फिर भी उसने ये सब उन्हें क्यों बता दिया।
"दोस्त वाकई में कमीने होते है।"
"सुनो बाबू जी वापस गांव जा रहे है आप उन्हें रोको ना" देवी जी का एक बार बार फिर शयनकक्ष में आगमन हुआ।
"जाना चाहते है तो जाने दो मैं क्यों रोकू, और वैसे भी जाने वालो को कौन रोक सका है।"
"अरे यार हद है तुम उनसे इतनी नफरत क्यों करते हो"
मैं चुप रहा।
"डैडी दादू को रोको न वो जा रहे है प्लीज"
एक और आया दादु का चमचा मुझसे कोई
कोई रेसपोंस न पा कर दोनों  एक दूसरे को देखने लगे
"ok उन्हें बस स्टैंड तक तो छोड़ के आ सकते हो"
" बाहर से रिक्शा मिल जायेगी, बैठो बसस्टैंड रेलवे स्टेशन जहां  जाना है जाओ कौन मना करता है।"
"बस यार बहुत हो गया चलो उठो ऐसे अच्छा नही लगता"
निशा ने मुझे जबरदस्ती उठाया
मैं बुझे मन से उठा bike स्टार्ट कर दी और हम दोनों बस स्टैंड की और चल दिए। छोटी छोटी गलियों से होती हुई bike अपनी मंज़िल की और बढ़ रही थी। हम दोनों चुपचाप बैठे थे।पता नही आखिरी बार कब हम दोनों के बीच कोई संवाद हुआ था।
जैसे जैसे मैं बड़ा होता गया मैंने बाबूजी की हरकतों का विरोध करना शरू कर दिया।कभी कभी हम दोनों के बीच बहुतबड़ी लड़ाई हो जाती पर मैं अम्मा को बचाने में कामयाब हो जाता।
जब वो अपने मंसूबो में कामयाब नही हो पाते तो फिर मुझे गलियां सुनते।
"हरामखोर तू अपने बाप की बेइज़्ज़ती करता है तुझे शर्म।नही आती"
इस बात को वो अपनी ईगो पर ले जाते और मौका मिलते ही माँ से बदला लेते।
जब मेरी नौकरी लगी तो मैं बहुत खुश हुआ की अब मै माँ को।इस जंजाल से बाहर निकल लुगा। चूंकि शहर गांव से बहुत दूर था इसलिए मुझे भी शहर में ही रहना था।लेकिन माँ ने मेरे साथ शहर जाने से मना कर दिया। मेरे बहुत मनाने के बाद भी वो मेरे साथ शहर आने को तैयार नही हुई।और मुझे उन्होंने मुझे कसम दे दि जिसके कारण मुझे बिना उनके ही शहर आना पड़ा।
जिस दिन मुझे शहर आना था उनकी आंखो से मानो इन्द्र देव स्वयं बरस रहे थे।मेरा मंन टूट चुका था।
"मैं शहर नही जाना चाहता ।" मैंने अम्मा से कहा।
"नही बेटा तु जरूर जा, अगर तु नही गया तो मैं अपने आप को माफ़ नही कर पाउंगी"
"लेकिन आप"
"मेरी चिंता मत कर बेटा, मैं ठीक हु।"
"कमल माँ का ख्याल रखना"
मैं गांव की यादों के साथ वहा से निकल लिया। जब भी मुझे समय मिलता मैं  गांव जाता और माँ से मिलता वहां कुछ भी नही बदला था।
और एक दिन वही हो गया जिसका  भय मुझे हमेशा डरता रहता था।  उस दिन को मैं ताउम्र नही भुला सकता। ऑफिस का फोन बजा वो मेरे लिए था। वो कमल की अवाज थी ।
"भाई तु जल्दी गांव आजा आम्मा की तबियत बहुत खराब है।"
तबियत खराब होने का कारण मैं जानता था।मैं बिना समय गंवाए गांव पहुंचा।माँ खाट पर लेटी हुई थी और दर्द से करहा रही थी।
"अम्मा अम्मा"
"अरे मेरा लाल आ गया"
हर माँ प्रेम का अथाह सागर होती है। सृष्टि मे विधमान सभी शक्तिओं मे प्रेम सबसे बड़ी शक्ति है और इसी शक्ति की उपस्थिति के कारण माँ का स्थान सर्वश्रेष्ठ है।
अपने दर्द को छिपा कर वो खाट से उठने की कोशिस करने लगी।
"न अम्मा आप लेटी रहो, क्या हुआ ।"
"कुछ नही, मैं ठीक हूँ।"
"राजीव ताइ को शहर मे किसी डॉ के पास ले जाना पड़ेगा इनकी तबियत बहुत खराब है मैं जानता हूँ"
कमल ने घर आते हुए कहा।
"हां चलो मैं शहर से गाड़ी लाया हूँ।"
"नही बेटा हम नही जा सकते तेरे बाबूजी आने वाले है उनके खाने का टाईम हो गया है।"
"मैं माँ से कह दूंगा वो ताउ जी को खाना दे देगी आप चिंता मत करो ।" कमल ने माँ को समझाया।
हम दोनो माँ को।लेकर शहर पहुच गए।
माँ तब तक बेहोश ही चुकी थी। डॉक्टर ने बताया की उनकी कोई पसली टूट चुकी थी और बहुत सी अंदरुनी चोटे थी जो काफी पुरानी थी।
"ताइ एक हफ्ते से खाट पर थी।" कमल ने कहा
"बेवकूफ और तु मुझे आज बता रहा है।" मैंने क्रोधित स्वर मे कमल से पूछा।
"अरे यार मैं आज ही गांव आया था।"
"रोक ले यही से तो बस मिलती है, अब गांव को जाने वाले रास्ते को भी भूल गया।"
बाबूजी की आवाज़ ने मुझे पुनः वर्तमान मे ला दिया।
ची ची ची ची ची..............
ब्रेक के साथ बाइक रुक गयी।
"तुमने पूछा नही की मैं यहाँ क्यो आया था, इतने सालो के बाद"
बाबूजी ने bike से उतरते हुए मुझसे पूछा।
"आपकी बस सामने खड़ी है।" कहते हुए मैंने bike का गेअर डाला।
"सुन ये रख ले" उन्होंने एक कागज़ का लिफाफा मेरी और बढ़ाते हुए कहा।

"ये क्या है" मैंने उस लिफाफे को अज़ीब सि नज़रों से देखते हुए पूछा।
"ये पांच लाख का चेक है मुझे कमल ने सब कुछ बता दिया है।, मैं अपने बेटे को जेल जाते नही देख सकता।"
"मेरा आप से जो भी रिश्ता था वो मेरी माँ की वजह से था उनके साथ ही ये रिश्ता भी चला गया, और रही मेरी परेशानियों की बात अगर आपकी मदद से मुझे ज़िन्दगी भी मिल रही होगी तो मैं उसे भी ठुकरा दूंगा।"
"लेकिन बेटा प्रायश्चित भी तो कुछ होता है" उनकी आवाज़ मे याचना का स्वर था। जो मैंने आज तक उनकी वाणी मे आज से पहले कभी महसूस नही किया।
"आपका प्रायश्चित मेरी माँ को तो वापस नही ल सकता"
मैंने bike का गेर डाला और आगे बढ़ गया
साइड मिरर सेदिख रहा था वो अभी भी वही खड़े थे और उनकी आँखे मुझे ही देख रही थी।
फिर वही दिन मेरी आँखों के सामने आ गया डॉक्टरों ने मेरी माँ को बचाने की बहुत कोशिश की लेकिन मेरी माँ के कमजोर शरीर ने उनका साथ नही दिया।
bike तेजी से उनसे दूर ज रही थी। मेरी आँखों से गिरते आंसू हवा मे उड़ते जा रहे थे।
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