“मुआवजा”
दुखी मन से वो घर से भर निकला लगता है आज फिर बच्चो को भूखा ही रहना पड़ेगा| मैं खाना लेकर लौटूंगा ये आश्वासन तो वो बच्चो को दे आया था, लेकिन कहाँ से ये तो वो भी नहीं जानता| पिछले साल बाढ़ और इस साल सूखा दोनों ही साल की फसले बर्बाद हो गयी|
यही सोचता वो गाँव से बाहर की तरफ जा रहा था| नुक्कड़ पर कुछ लोग खड़े दिखे |
“चलो यार उसके बच्चो को तो भला हो गया|” हरी कह रहा था|
“क्या हुआ भैया” उसने उत्सुकता वश पूछा
“अरे नारायण जो पिछले साल ट्रेन से काटकर मर था| उसके बीवी बच्चो को रेलवे ने 5 लाख मुआवज़े में दिए|”
अगले दिन पास के रेलवे लाइन पर एक और लाश पड़ी मिली| उसके बच्चे अभी तक इंतजार कर रहे हैं की उनका पिता उनके लिए खाना लेकर आता ही होगा|
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