शून्य
जब से जाना है
अपने इस शून्य को
जो है छनिक
मिट रहा है निरंतर
फिर भी पकडे बैठा था इसे
अपना मान कर
अब सत्य जानकर
तलाश में हूँ
उस शून्य की
जो है अन्नंत
स्रोत्र है जो
समस्त स्रष्टि के सृजन का
जो बसा है कण कण में
चिड़ियों की चहचाहट में
सूरज के प्रकाश में
नदी के जल में
तलाशा उसे
हर जरें में
सुबह की रौशनी
रात के अंधेरे में
धुप की तपिश
छांव की ठंडक में
किन्तु उसे पाने का
हर प्रयास
परिणाम शून्य से
आज बन चूका है शून्य
जब भी निकला
उस शून्य की तलाश में
प्रतिफल में मिला शून्य
जिस शून्य से परिणय को
तत्परता से तलाशा
शून्य को हर जगह
जाना भी न इतना
इसी शून्य में ही छिपा है कंही
वो शून्य |
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